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प्रवासी साहित्य

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Course Type Course Code No. Of Credits
Discipline Core NSOL1DS003 4

Course Coordinator(s) :   प्रो. सत्यकेतु सांकृत, डॉ.महेन्द्र प्रजापति   

1. Does the course connect to, build on or overlap with any other courses offered in AUD? No

2. Specific requirements on the part of students who can be admitted to this course: None (Pre-requisites; prior knowledge level; any others – please specify)

3. No. of students to be admitted (with justification if lower than the usual cohort size is proposed): विश्वविद्यालय नियमानुसार

4. Course scheduling (semester; semester-long/half-semester course; workshop mode; seminar mode; any other – please specify): Semester long

पाठ्यक्रम विवरण (Course Description)

इस कोर्स के माध्यम से भारत के बाहर हिंदी में लिखे जा रहे साहित्य को समझाने का प्रयास किया जाएगा| भारत एक बहुसांस्कृतिक,बहुभाषिक देश है, इसलिए यहाँ का साहित्य भी विभिन्न विमर्शों, परिवेशों और भावनाओं को अभिव्यक्त करता है | प्रवासी साहित्य हिंदी भाषा के वैश्विक पटल पर हो रहे विस्तार एवं चर्चा को समझने की एक दृष्टि भी विकसित करता है | प्रवासी साहित्य भारत से अपनी संस्कृति भाषा और समाज से कटकर जीविका के लिए विदेशों में संघर्ष करते भारतीयों की मनोदशा और आंतरिक पीड़ा को अभिव्यक्त करता है | अपने परिवार और समाज से दूर इन भारतीयों के लिए लेखन अपने एकांत को समाप्त करने का सबसे सशक्त जरिया है | इसके अध्ययन के दो मूल आधार होंगे| पहला आधार तो उन गिरमिटिया मजदूरों के वंशजों के लेखन का है, जो अपने समाज से कटकर मॉरिशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिडाड में आदि स्थानों पर बसा दिये गए| उन गिरमिटिया मजदूरों की दूसरी पीढ़ी जो वहीँ पैदा हुई लेकिन अपने पूर्वजों की पीड़ा को भूला नहीं पायी और उस दर्द को कहानी, उपन्यास, कविता आदि माध्यमों में व्यक्त किया| दूसरा आधार, उन भारतीय लोगों का है जो जीविकोपार्जन के लिए एनआरआई के रूप में सुख-सुविधा की चाह में विदेशों में बस तो गए लेकिन जल्द ही उन्हें एहसास हो गया कि अपनी भाषा, संस्कृति और समाज की संवेदना उनसे छूट रही है, इसलिए अपनी संवेदनाओं को व्यक्त करने करने के लिए उन्होंने अपनी भाषा में लिखना शुरू किया।

पाठ्यक्रम उद्देश्य (Course Objectives)

  • प्रवासी हिन्दी साहित्य की अवधारणा, स्वरूप और विकासक्रम से विद्यार्थियों को परिचित कराना।
     
  • प्रवासी भारतीयों के सामाजिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक अनुभवों को साहित्य के माध्यम से समझाना।
  • गिरमिटिया श्रमिकों तथा प्रवासी भारतीय समुदाय की पीड़ा, संघर्ष और स्मृतियों की साहित्यिक अभिव्यक्ति का अध्ययन कराना।
  • प्रवासी साहित्य के माध्यम से भाषा, संस्कृति और पहचान के प्रश्नों की समझ विकसित करना।
  • वैश्विक परिप्रेक्ष्य में हिन्दी भाषा और साहित्य के विस्तार तथा उसकी सांस्कृतिक भूमिका को समझाना।
  • विद्यार्थियों में प्रवासी साहित्य के अध्ययन के माध्यम से संवेदनशील, आलोचनात्मक और बहुसांस्कृतिक दृष्टि विकसित करना।

Course Outcomes:  Course Outcomes describe what students are expected to know and be able to do by the end of a specific course. Each CO should be clearly observable and measurable. Mention 4-6 course outcomes.  At the end of the course, students will be able to:

  • CO1 : विद्यार्थी प्रवासी हिन्दी साहित्य की अवधारणा, स्वरूप और विकासक्रम को समझ सकेंगे।
  • CO2 : विद्यार्थी प्रवासी भारतीयों के सामाजिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक अनुभवों से परिचित हो सकेंगे।
  • CO3 : विद्यार्थी गिरमिटिया श्रमिकों तथा प्रवासी भारतीय समुदाय की पीड़ा, संघर्ष और स्मृतियों की साहित्यिक अभिव्यक्तियों का विवेचन कर सकेंगे।
  • CO4 : विद्यार्थी प्रवासी साहित्य के माध्यम से भाषा, संस्कृति और पहचान से जुड़े प्रश्नों को समझ सकेंगे।
  • CO5 : विद्यार्थी वैश्विक परिप्रेक्ष्य में हिन्दी भाषा और साहित्य के विस्तार तथा उसकी सांस्कृतिक भूमिका का विश्लेषण कर सकेंगे।
  • CO6 : विद्यार्थी प्रवासी साहित्य के अध्ययन के आधार पर संवेदनशील, आलोचनात्मक और बहुसांस्कृतिक दृष्टि विकसित कर सकेंगे।

Modules and Readings

मॉड्यूल 1 -   प्रवासी साहित्य : अवधारणा और स्वरुप

भारत में प्रवासी भारतीयों की चर्चा तथा उनके सम्बन्ध में गंभीर चिंतन मनन का शुभारम्भ महात्मा गांधी द्वारा दक्षिण अफ्रिका में व्यतीत किये गये लगभग इक्कीस वर्षों के उस संघर्षमयी जीवन यात्रा से माना जा सकता है जिसने पूरे विश्व का ध्यान अपनी और आकृष्ट किया| सही अर्थों में यह भारत के प्रवासी समुदाय से एकात्म स्थापित करने की एक ऎसी आरम्भिक पहल थी जिसनें जल्द ही विभिन्न देशों में रहनेवाले गिरमिटिया बने भारतीय मजदूरों में एक नयी संचेतना का संचार किया| उनमें स्वत्व का भाव जागृत कर अपनी संस्कृति एवं भाषा को अक्षुण्ण बनाए रखने का भाव पुष्ट किया| उनकी इसी भावना की अभिव्यक्ति कालन्तर में साहित्य के जिस रूप से हुई उनमें प्रवासी साहित्य के आरम्भिक रूप की तलाश की जा सकती है| हिन्दी के प्रवासी साहित्य की स्थिति अंग्रेजी से तनिक भिन्न है| हिन्दी के आलोचकों नें हिन्दी के प्रवासी साहित्य को जिस तरह के नजरिये से देखना शुरू किया उससे उसे वह गरिमा नहीं मिल पाई जिसका वह हकदार था| परन्तु विगत तीन दशकों से जिस तरह के काम इसके अंतर्गत हुए हैं उससे वह भारत तथा विदेशों के हिन्दी जगत में एक गंभीर चर्चा के विषय के रूप में उभरकर सामने आया है और हिन्दी के आलोचकों नें इसके लेखन की गंभीरता को भी स्वीकार किया है| हिन्दी के प्रवासी साहित्य का एक अपना वैशिष्ठ्य है जो उसकी संवेदना, परिपक्व जीवन दृष्टि और परिवेश में दिखाई पड़ता है| मॉरिशस, फिजी, सूरीनाम आदि देशों में भारतवंशियों की दूसरी-तीसरी पीढी के साहित्य में उनका देश बोलता है जिस पर निश्चित ही भारतीय संस्कृति, दर्शन था मूल्यों का गहरा प्रभाव है| अमेरिका, ब्रिटेन आदि देशों के लेखक पहली पीढी के हैं और इसी कारण उनकी रचनाओं में स्वदेश-विदेश दोनों हैं| इनकी रचनाओं में अमेरिका एवं यूरोप के देशों की सुख-समृद्धि तथा तनाव एवं संघर्ष है और साथ ही स्वदेश की मिट्टी की मधुर स्मृति भी गुँथी हुई है| इस तरह दोनों ही प्रकार के प्रवासी साहित्य में भारत अवस्थित है, चाहे उसकी धर्म-संस्कृति के रूप में चाहे नोस्टेल्जिया अथवा अस्तित्व एवं अस्मिता निर्मिती के सूत्र की तलाश के रूप में| भारत के हिन्दी समाज के लिए यह अपेक्षाकृत नई वस्तु है जिसमें नये कथानक और पात्रों के माध्यम से प्रवासी भारतीयों के जीवन संघर्ष को प्रस्तुत किया गया है| हिन्दी के इस प्रवासी साहित्य का संसार अब इतना व्यापक हो चुका है कि उसने अपना एक आकाश बनाने में सफलता हासिल कर ली है| प्रवासी साहित्य आज ऐसे मुकाम पर पहुँच चुका है जहाँ वह हिन्दी साहित्य के व्यापक मानचित्र में उचित एवं सम्मानपूर्ण स्थान का मजबूत दावेदार बन बैठा है|  

निर्धारित विषय:

  • प्रवासी साहित्य : अर्थ और अवधारणा 
  • प्रवासी साहित्य की वैचारिकी 
  • प्रवासी साहित्य : शिल्प और भाषा

सहायक पाठ्य सामग्री  :- 

  • प्रवासी साहित्य : जोहान्सबर्ग से आगे, प्रधान संपादक, डॉ. कमल किशोर गोयनका, प्रकाशक-विदेश मंत्रालय, भारत सरकार, साउथ ब्लॉक, नई दिल्ली, संस्करण-2015
  • कमल किशोर गोयनका : हिंदी का प्रवासी साहित्य, प्रथम संस्करण 2011
  • 10 वाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन (स्मारिका)
  • अप्रवासी : मंजु कपूर , रैण्डम हाउस इंडिया, नोएडा, 200

माड्यूल 2 -  प्रवासी हिंदी उपन्यास 

इस इकाई में प्रवासी हिंदी साहित्य के प्रमुख उपन्यासों का अध्ययन किया जाएगा। उपन्यास कथा साहित्य की महत्त्वपूर्ण विधा है, जिसमें एक कथा सूत्र होता है। उपन्यास में लेखक अपने यथार्थ और रचना शिल्प को प्रमुखता से व्यक्त कर सकता है। प्रवासी हिंदी उपन्यासों में भारतीय आचार- विचार, भारतीय संस्कृति, भारतीय और विदेशी संस्कृति के द्वंद्व और भारतीयों  जैसी ही संवेदनाओं को व्यक्त किया गया है। प्रवासी हिंदी उपन्यास में गिरमिटिया प्रथा और उसके दुःख- दर्द को भी प्रमुखता से व्यक्त किया गया है।

 निर्धारित विषय:

  • प्रवासी हिंदी उपन्यास की यात्रा : संवेदना और शिल्प   
  • हम प्रवासी- अभिमन्यु अनत (मॉरिशस)
  • हवन- सुषम बेदी (अमेरिका) 
  • व्हेयर टू आई बिलांग- अर्चना पैन्यूली (डेनमार्क)

सहायक पुस्तकें एवं सामग्री :

  • बसंत : त्रैमासिक, महात्मा गाँधी संस्थान, मॉरीशस की पत्रिका, अप्रवासी विशेषांक, अंक 41, 1984.
  • कमल किशोर गोयनका (सम्पादक): प्रवासी साहित्य, जोहान्सबर्ग से आगे
  • कमल किशोर गोयनका (सम्पादक): हिंदी प्रवासी साहित्य (गद्य-विधाएँ)

माड्यूल 3 - प्रवासी हिंदी कहानी

इस इकाई में प्रवासी हिंदी कहानियों का अध्ययन प्रस्तावित है। प्रवासी हिंदी कहानियों की अंतर्यात्रा को समझते हुए प्रमुख कहानी लेखकों की कहानियों का अध्ययन किया जाएगा। प्रवासी हिंदी कहानियां कथासूत्र, शैली और शिल्प की दृष्टि से विशिष्ट पहचान रखती हैं। प्रवासी हिंदी कहानियों में महिला लेखन के सार्थक उपस्थिति है। परिवेशगत समस्याएं, स्त्री-पुरुष सम्बन्ध, वैयक्तिक मनोदशाओं का चित्रण इन कहानियों में मौजूद है।

निर्धारित  विषय :– 

  • रामदेव धुरंधर – सीमांत (मॉरिशस)
  • उषा राजे सक्सेना – आंटोप्रेन्योर (ब्रिटेन)
  • स्नेह ठाकुर – नारी मन  (कनाडा)
  • ज़किया ज़ुबैरी – सांकल (ब्रिटेन) 
  • तेजेंद्र शर्मा – गंध (ब्रिटेन)
  • जय वर्मा गुलमोहर (बर्मिंघम

सहायक पाठ्य सामग्री एवं ग्रन्थ :-

  • प्रो. नंदकिशोर पांडेय (प्रधान सम्पादक): प्रवासी जगत, त्रैमासिक पत्रिका, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा-252005, जुलाई-सितंबर 2018, पृष्ठ संख्या 206.
  • वर्तमान साहित्य’ :  कुंवरपाल सिंह, नमिता सिंह (सम्पादक), जनवरी-फरवरी-2006
  • कमल किशोर गोयनका : विश्व हिंदी रचना, भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद्, नई दिल्ली-2003
  • प्रवासी साहित्य : जोहान्सबर्ग से आगे, प्रधान संपादक, डॉ. कमल किशोर गोयनका, प्रकाशक-विदेश मंत्रालय, भारत सरकार, साउथ ब्लॉक, नई दिल्ली, संस्करण-2015

माड्यूल 4 - प्रवासी हिंदी कथेतर साहित्य 

इस इकाई में कथेतर साहित्य का अध्ययन साहित्य किया जाएगा। कथेतर साहित्य से तात्पर्य ऐसे साहित्य से है जो कथा साहित्य(उपन्यास, कहानी) से भिन्न विधा हो। इनमें कविता, संस्मरण, जीवनी, आत्मकथा, ललित निबन्ध, लेख इत्यादि आते हैं। यह साहित्यिक विधाएं भी प्रवासी हिंदी लेखन में विस्तार पा रहीं हैं। कविता विधा की बात की जाए तो सैकड़ों कवि अपनी भावनाओं को कविता के माध्यम से व्यक्त कर रहे हैं और कविता लेखन की प्रवासी साहित्य में सुदीर्घ परम्परा है। 

निर्धारित विषय : 

कविताएँ :

  • क्लोन्ज़ –दिव्या माथुर (ब्रिटेन)
  • गुमशुदा विचार – सुधा ओम धींगरा (अमेरिका)
  • तुम्हारी कमी ! – पद्मेश गुप्ता (ब्रिटेन)
  • संस्मरण : - अपना अपना युद्ध - शशि पाधा (अमेरिका)
  • ललित निबंध :गुलमोहर दर गुलमोहर- पूर्णिमा वर्मन (संयुक्त अरब इमारात)  
  • लेख : वैचारिक उर्जा – मृदुल कीर्ति (आस्ट्रेलिया)

सहायक पाठ्य सामग्री  :-

  • पीयूष कुमार द्विवेदी : कविता का प्रवासी स्वर-संदर्भः गिरमिटिया देश मॉरीशस और फीजी, प्रवासी जगत, त्रैमासिक पत्रिका, केंद्रीय हिंदी संस्थान, अक्टूबर-दिसंबर, पृष्ठ संख्या 29-30
  • प्रवासी साहित्य : जोहान्सबर्ग से आगे, प्रधान संपादक, डॉ. कमल किशोर गोयनका, प्रकाशक-विदेश मंत्रालय, भारत सरकार, साउथ ब्लॉक, नई दिल्ली, संस्करण-2015

Assessment (Including Skills to be tested as per NCrF):

  • Response Essay/PPT/Assignment-1 ( 25Marks)
  • Midterm Exam/PPT/Assignment-2/Project (25 Marks)
  • End Term Exam (50 Marks)
     
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