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हिन्दी का वैचारिक जगत

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Course Type Course Code No. Of Credits
Discipline Core SOL2HN310 4

Course Coordinator(s)  :   प्रो. गोपाल जी प्रधान

Does the course connect to, build on or overlap with any other courses offered in AUD? No 

Specific requirements on the part of students who can be admitted to this course: None (Pre-requisites; prior knowledge level; any others – please specify)

No. of students to be admitted (with justification if lower than the usual cohort size is proposed): विश्वविद्यालय नियमानुसार

Course scheduling (semester; semester-long/half-semester course; workshop mode; seminar mode; any other – please specify): Semester long

How does the course link with the vision of AUD? 

ज्ञान की ऐतिहासिक व सामाजिक ज़िम्मेदारियों का आलोचनात्मक अध्ययन करते हुए विद्यार्थी समाज-विकास में ज्ञान की प्रासंगिकता और भूमिका समझ सकेंगे। समाज के वैज्ञानिक विकास के लिए यह समझ विकसित करना अम्बेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली के आदर्शों के अनुरूप है।

How does the course link to the specific programme(s) in which it is offered? 

परास्नातक हिंदी के विद्यार्थी के लिए 'हिन्दी का वैचारिक जगत' पाठ्यक्रम का अध्ययन इसलिए आवश्यक है क्योंकि इस पाठ्यक्रम के जरिये वह हिंदी के सांस्कृतिक भंडार में मौजूद साहित्यिक के अलावा अन्य बौद्धिक समृद्धियों को भी समझ सकेगा और साहित्य-अध्ययन में उनका इस्तेमाल कर सकेगा।

पाठ्यक्रम विवरण (Course Description)

हिंदी साहित्य के साथ ज्ञान का अटूट रिश्ता है । आधुनिक काल से पहले के भी साहित्य में भांति भांति की प्राकृतिक प्रक्रियाओं और क्रिया व्यापार का वर्णन होता रहा है । कवि अर्थात साहित्यकार के लिए तरह तरह के विषयों की जानकारी जरूरी मानी जाती रही है । आधुनिक काल के बाद तो ऐसा होना इस हद तक अनिवार्य रहा कि अधिकांश साहित्यकार किसी न किसी ज्ञानानुशासन के लेखन से जुड़े रहे हैं । हिन्दी साहित्य के किसी भी अध्येता के लिए इस पारस्परिकता का बोध जरूरी है । साहित्य की विषयवस्तु प्रकृति और मानव जीवन रहे हैं जिनकी समझ ज्ञान के विभिन्न अनुशासनों में प्रणालीबद्ध होकर प्रकट हुई है । इस निधि से विद्यार्थियों को परिचित कराना इस पाठ्यक्रम का ध्येय है ।

पाठ्यक्रम उद्देश्य (Course Objectives)

  • हिंदी भाषा के ज्ञान भंडार से विद्यार्थियों को परिचित कराना।
  • विद्यार्थी में साहित्य व ज्ञान के अंतरसंबंधों की समझ विकसित करना।
  • प्रकृति और मानव जीवन का ज्ञानात्मक विश्लेषण। 

Course Outcomes:  Course Outcomes describe what students are expected to know and be able to do by the end of a specific course. Each CO should be clearly observable and measurable. Mention 4-6 course outcomes.  At the end of the course, students will be able to:

  • CO1: विद्यार्थी साहित्य को ज्ञान-संसार के व्यापक परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकित कर सकेंगे।
  • CO2: विद्यार्थी साहित्य के अध्ययन में अंतरनुशासनिक दृष्टिकोण के प्रति अपना दृष्टिकोण विकसित कर सकेंगे।
  • CO3: विद्यार्थी गैर-साहित्यिक प्रतिमानों की साहित्यिक उपादेयता की समझ विकसित कर सकेंगे।
  • CO4: विद्यार्थी हिंदी-रचना-सम्पदा को देखने की एक समग्र दृष्टि विकसित कर सकेंगे।
  • CO5: विद्यार्थी साहित्यिक पाठों का वैचारिक परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण करते हुए उनके निहितार्थों को स्पष्ट कर सकेंगे।
  • CO6: विद्यार्थी विभिन्न वैचारिक धाराओं के आलोक में साहित्य की व्याख्या करते हुए स्वतंत्र एवं आलोचनात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत कर सकेंगे।

मॉड्यूल 1 :   हमारे देश में दार्शनिक चिंतन की सुदीर्घ परम्परा रही है । हिन्दी के लेखकों को इस चिंतन की विरासत सहज ही उपलब्ध रही है । भारतीय दर्शनों में षड दर्शन के अतिरिक्त बौद्ध और जैन दर्शन की मौजूदगी के चलते यह परम्परा विविधतापूर्ण रही है । हिन्दी के विचारकों में भी हमें यह विविधता नजर आती है । इस माड्यूल में कुछ प्रतिनिधि विचारकों के एतद्विषयक लेखन का परिचय प्रदान किया जायेगा ।        

निर्धारित विषय : दर्शन- राहुल, आचार्य नरेन्द्र देव, रामविलास शर्मा, विवेकानंद, सहजानंद सरस्वती

सहायक पाठ्य सामग्री एवं पुस्तकें –

  • दर्शन -दिग्दर्शन, राहुल सांकृत्यायन, किताब महल, दिल्ली, 2018
  • बौद्ध धर्म दर्शन, आचार्य नरेंद्र देव, मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी, 2017
  • गीता हृदय, सहजानन्द सरस्वती, http://www.hindisamay.com/content/1609/1/सहजानन्द-सरस्वती-रचनावली-स्वामी-सहजानन्द-सरस्वती रचनावलीखंड-3.cspx
  • राजयोग, विवेकानन्द, प्रभात प्रकाशन, दिल्ली, 2014

मॉड्यूल 2 :   भारत में बहुत पहले ही कौटिल्य ने अर्थशास्त्र नामक पुस्तक लिखी थी लेकिन उसमें समूची राजव्यस्था के संचालन का वर्णन है । अनुशासन के रूप में आधुनिक काल में जिस अर्थशास्त्र का यूरोपीय देशों में विकास हुआ उसका प्रभाव हमारे देश में भी पड़ा । हिन्दी में मानक भाषा का विकास करने में अग्रणी चिंतक महावीर प्रसाद द्विवेदी ने साहित्येतर ज्ञान को भी हिन्दी में लाने का अनथक प्रयास किया । अनुशासन के रूप में भी उन्होंने इसे संपत्तिशास्त्र कहकर दृष्टि की नवीनता का परिचय दिया । इसी क्रम में देव नारायण द्विवेदी की पुस्तक देश की बात में भी औपनिवेशिक आर्थिकी का प्रतिपक्ष निर्मित  करने का गम्भीर प्रयास दिखायी पड़ता है । किताब का नाम गणेश सखाराम देउस्कर की किताब से मिलते जुलते होने के कारण इस पर नजर नहीं जाती लेकिन उपनिवेशवाद विरोधी आर्थिकी के लिहाज से यह किताब बेहद महत्व की है । इस माड्यूल में विद्यार्थी हिन्दी के इस उपेक्षित पहलू से परिचित होंगे ।    

निर्धारित विषय:-

अर्थशास्त्र- महावीर प्रसाद द्विवेदी, देव नारायण द्विवेदी

सहायक पाठ्य सामग्री :-

मॉड्यूल 3 :   हिन्दी के साहित्येतर लेखन में समाज और संस्कृति का क्षेत्र अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है । साहित्यकारों में हजारी प्रसाद द्विवेदी, अज्ञेय और कुबेरनाथ राय के लेखन में संस्कृति के प्रश्न पर प्रभूत विचार हुआ है । इस माड्यूल में विद्यार्थियों का परिचय विचारकों की ऐसी दुनिया से होगा जो साहित्य के आसपास रहते हुए भी सामाजिक विज्ञानों की मुख्यधारा में मौजूद रहे और इस विषय पर हिन्दी भाषा में लेखन किया है । समाज और संस्कृति को देखने की स्त्री दृष्टि के भी अध्यापन का प्रयास इस माड्यूल में किया जायेगा । 

निर्धारित विषय:-

समाजशास्त्र, संस्कृति- वासुदेव शरण अग्रवाल, श्यामाचरण दुबे, पूरनचंद्र जोशी, दिनकर, लोहिया और महादेवी

सहायक पाठ्य सामग्री :-

  • पृथ्वीपुत्र, वासुदेव शरण अग्रवाल, प्रभात प्रकाशन, दिल्ली, 2018
  • परिवर्तन और विकास के सांस्कृतिक आयाम, पूरनचंद्र जोशी, राजकमल, दिल्ली, 2009
  • संस्कृति के चार अध्याय, रामधारी सिंह दिनकर, लोकभारती, प्रयागराज, 2011
  • धरतीमाता- भारतमाता, राम मनोहर लोहिया, लोकभारती, प्रयागराज, 2008
  • श्रृंखला की कड़ियां, महादेवी वर्मा, लोकभारती, प्रयागराज, 2016

मॉड्यूल 4:  पूरी दुनिया में पर्यावरण और पारिस्थितिकी ज्ञान की अत्यंत महत्वपूर्ण शाखा के रूप में विकसित हुई है । हिन्दी में इस विषय पर जो भी लेखन उपलब्ध है उससे परिचय हिन्दी के अध्येता के लिए बहुत आवश्यक है । नदियों के बारे में हवल्दार त्रिपाठी और बेगड़ के लेखन के अतिरिक्त अनुपम मिश्र ने राजस्थान में जल संरक्षण की पारम्परिक विधियों का न केवल संधान और दस्तावेजीकरण किया बल्कि उसके अनुप्रयोग से बहुतेरे इलाकों का हरितीकरण भी किया । इसी क्रम में सोपान मिश्र ने भी उस अधुनातन ज्ञानानुशासन में योगदान किया है । हाल में जलवायु परिवर्तन के साथ खेती की संरचना को लेकर भी कुछ चिंतकों ने विचार किया है । पारिस्थितिकी और साहित्य की पारस्परिकता के नजरिये से इस माड्यूल का अपार महत्व है ।   

निर्धारित विषय:-

पर्यावरण- अनुपम मिश्र, सोपान जोशी, सुषमा नैथानी

सहायक पाठ्य सामग्री :-

  • आज भी खरे हैं तालाब, अनुपम मिश्र, प्रभात, दिल्ली, 2019
  • राजस्थान की रजत बूंदें, अनुपम मिश्र, गांधी शांति प्रतिष्ठान, दिल्ली, 1995
  • अन्न कहां से आता है, सुषमा नैथानी, नेशनल बुक ट्रस्ट, दिल्ली, 2020
  • बिहार की नदियां, हवल्दार त्रिपाठी, बिहार हिंदी ग्रंथ अकादमी, पटना, 2012

Assessment (Including Skills to  be tested as per NCrF):

  • Response Essay/PPT/Assignment-1 (25Marks)
  • Midterm Exam/PPT/Assignment-2/Project (25 Marks)
  • End Term Exam (50 Marks)
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