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साहित्य का समाजशास्त्र

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Course Type Course Code No. Of Credits
Discipline Core SOL2HN311 4

Course Coordinator(s)  :  प्रो. गोपाल जी प्रधान

Does the course connect to, build on or overlap with any other courses offered in AUD? No 

Specific requirements on the part of students who can be admitted to this course: None (Pre-requisites; prior knowledge level; any others – please specify)

No. of students to be admitted (with justification if lower than the usual cohort size is proposed): विश्वविद्यालय नियमानुसार

Course scheduling (semester; semester-long/half-semester course; workshop mode; seminar mode; any other – please specify): Semester long

How does the course link with the vision of AUD? 

समाज में साहित्य और साहित्य में समाज की उपस्थिति को समझने से विद्यार्थी समाज की संवेदना को अधिक अच्छी तरह ग्रहण कर सकेंगे । यह पाठ्यक्रम उन्हें सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया और सामाजिक आकांक्षा को स्वर देने और उसे सुनने की कुशलता प्रदान करेगा जो हमारे विश्वविद्यालय के लक्ष्य से मेल खाता है । 

How does the course link to the specific programme(s) in which it is offered? 

 परास्नातक हिंदी के विद्यार्थी के लिए साहित्य का समाजशास्त्र बहुत जरूरी अनुशासन समझा जाता है । इस स्तर पर विद्यार्थी में आलोचनात्मक क्षमता पैदा हो जाने की आशा की जाती है । इसका ध्यान रखते हुए ही उसे परास्नातक पाठ्यक्रम में एक शोधपत्र भी लिखना आवश्यक है । इस पाठ्यक्रम के अध्ययन से वह हिंदी साहित्य का गहन समाजशास्त्रीय विश्लेषण कर सकेगा/गी । इससे उसको लघु शोध के प्रश्नपत्र में बुनियादी सहायता मिलेगी । विद्यार्थी के भीतर साहित्यिक रचनाओं को आलोचनात्मक निगाह से देखने समझने की योग्यता विकसित करने के लिहाज से यह प्रश्नपत्र नितांत उपयोगी साबित होगा ।

पाठ्यक्रम विवरण (Course Description)

साहित्य के अध्ययन और अध्यापन में उसकी रचनात्मकता को सामाजिक परिप्रेक्ष्य में रखकर समझने की परिपाटी बहुत समय से चली आ रही है । हिंदी साहित्य को उच्च शिक्षा हेतु जबसे स्वीकार किया गया तभी से उसकी रचनाओं को तत्कालीन युग के साथ जोड़कर देखा जाता रहा । साहित्य के साथ समाज के इस अटूट संबंध को लेखक और पाठक के रूप में उपस्थित माना जाता है । साहित्यिक सृजन के विभिन्न रूपों को भी सामाजिक वातावरण के साथ जोड़कर देखा जाता है । किसी भी रचना को समझने के क्रम में लेखक के जीवन की परिस्थितियों का बयान परोक्ष रूप से उसकी रचना में उसके समय की मौजूदगी की पहचान है । साथ ही रचनाकार के मनोविज्ञान को भी साहित्य की समझ के लिहाज से जानना आवश्यक होता है । साहित्य को समझने की इस विद्या की समझ को गहराई के साथ परिचित कराना इस पाठ्यक्रम का ध्येय है ।   

पाठ्यक्रम उद्देश्य (Course Objectives)

  • साहित्य को सामाजिक परिप्रेक्ष्य में देखने का अभ्यास पैदा करना ।
  • रचना को रचयिता के मनोविज्ञान के आधार पर विश्लेषित करने की आदत डालना ।
  • साहित्य में लेखक के साथ ही पाठक के हस्तक्षेप को भी शामिल करने का कौशल विकसित करना ।      

Course Outcomes:  Course Outcomes describe what students are expected to know and be able to do by the end of a specific course. Each CO should be clearly observable and measurable. Mention 4-6 course outcomes.  At the end of the course, students will be able to:

  • CO1: विद्यार्थी साहित्य के गहन एवं सूक्ष्म विश्लेषण की परंपरा को समझते हुए साहित्यिक कृतियों का आलोचनात्मक अध्ययन कर सकेंगे।
  • CO2: विद्यार्थी साहित्यिक कृतियों के माध्यम से साहित्यकार की मानसिकता एवं अंत:प्रवृत्तियों की पहचान कर सकेंगे।
  • CO3: विद्यार्थी साहित्य में निहित युगीन अभिव्यक्तियों को तत्कालीन सामाजिक संदर्भों में व्याख्यायित कर सकेंगे।
  • CO4: विद्यार्थी रचनाकार की सामाजिक अवस्थिति उसकी रचनाके माध्यम से  देख पाएंगे और विश्लेषित कर सकेंगे।
  • CO5: विद्यार्थी साहित्यिक पाठों का समाजशास्त्रीय दृष्टि से आलोचनात्मक परीक्षण करते हुए उनके सामाजिक निहितार्थों को स्पष्ट कर सकेंगे।
  • CO6: विद्यार्थी साहित्य और समाज के अंतर्संबंधों के प्रति व्यापक समझ विकसित करते हुए समकालीन संदर्भों में स्वतंत्र एवं तर्कपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत कर सकेंगे।

मॉड्यूल 1 :   साहित्य को देखने के समाजशास्त्रीय नजरिये की स्थापना उसके विश्लेषण के रूपवादी रुझान के बरक्स हुई । इस धारणा को स्पष्ट करने के लिए इस अनुशासन के विभिन्न आयामों का निदर्शन आवश्यक है । इसके लिए रचना में समाज को खोजने के पारम्परिक तरीके के साथ ही समाज में रचना की उपस्थिति को देखने का नया तरीका बताना जरूरी है । समाज का घनिष्ठ संबंध समय के साथ होता है और साहित्यिक विधाओं की लोकप्रियता भी समय सापेक्ष रही है । साहित्य का सृजन भी मौखिक से लिखित तथा अब नयी तकनीक से जुड़ता जा रहा है । साहित्य के साथ लेखक का जुड़ाव तो सर्वस्वीकृत है लेकिन पाठक की मौजूदगी के बारे में जानने से साहित्य को देखने के नये द्वार खुलते हैं । 

निर्धारित विषय : 

  • साहित्य के समाजशास्त्र की अवधारणा
  • साहित्य और समाज
  • लेखक की सामाजिकता
  • रचना की सामाजिकता
  • विधाओं का समाजशास्त्र
  • पाठ और पाठक
  • रचना में समाज की अभिव्यक्ति

सहायक पाठ्य सामग्री एवं पुस्तकें – 

  • साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका- मैनेजर पाण्डेय , हरियाणा ग्रंथ अकादमी, पंचकूला, 2003 ।
  • साहित्य का समाजशास्त्रीय चिंतन, निर्मला जैन, हिंदी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, 2009 । 
  • साहित्य का समाजशास्त्र, डॉ. नगेन्द्र, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, 1982 ।  
  • साहित्य का समाजशास्त्र - बच्चन सिंह,लोकभारती प्रकाशन, प्रयागराज, 1998 ।
  • भक्तिकाव्य का समाज दर्शन- प्रेमशंकर, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 1995.
  • सद्गति या किसी साहित्यिक रचना पर बनी फ़िल्म के जरिए विधाओं की विशेषता का विश्लेषण ।  

मॉड्यूल 2 साहित्य के समाजशास्त्र के लिहाज से मार्क्सवाद का महत्व बहुत अधिक रहा है । इस शास्त्र के प्रमुख विद्वान आम तौर पर इससे कमोबेश जुड़े रहे हैं । उन सबके लेखन से साहित्य और कलात्मक सृजन के विभिन्न रूपों के साथ मार्क्स के चिंतन के विभिन्न आयाम खुले हैं । इस नाते इतिहास के विकास के ढांचे और उसकी प्रक्रिया को समझने से सृजनात्मक अभिव्यक्तियों के साथ उसके संबंध को देखना आसान हो जायेगा । साहित्य में विचारधारा की मौजूदगी का सवाल भी बहसतलब सवाल रहा है । हिंदी आलोचना के भीतर भी इन सवालों के साथ टकराने की लम्बी धारा रही है । उससे परिचय स्नातकोत्तर हिंदी के विद्यार्थी को समृद्ध करेगा 

निर्धारित विषय:-

  • मार्क्सवाद और साहित्य का समाजशास्त्र
  •  वर्ग संघर्ष और इतिहास
  • कला और विचारधारा
  •  सामाजिक बदलाव और साहित्य
  • रचना का सामाजिक प्रयोजन 

सहायक पाठ्य सामग्री :-

  • साहित्य और कला, मार्क्स-एंगेल्स, राहुल फ़ाउण्डेशन, लखनऊ, 2006 
  • मार्क्सवाद और साहित्यालोचन- टेरी ईगलटन (अनुवाद- वैभव सिंह), आधार प्रकाशन, पंचकूला, हरियाणा, 2013 
  • कार्ल मार्क्स: कला और साहित्य चिंतन, संपादक-नामवर सिंह (अनुवाद- गोरख पाण्डेय), राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2018
  • रेमंड विलियम्स, Marxism and Literature, The city and country.
  • वाल्टर बेंजामिन, Story teller, Thesis on the Philosophy of History.

मॉड्यूल 3 :   किसी भी साहित्यिक रचना में लेखक को मनोवैज्ञानिक चित्रण का सहारा लेना पड़ता है । उपन्यासों के पात्रों के सिलसिले में ऐसा सबसे अधिक होता रहा है । लेखकों का मनोविज्ञान समझना भी साहित्यालोचन में गम्भीर विचार का मुद्दा रहा है । साहित्यिक प्रवृत्तियों के निर्माण में भी सामूहिक चित्तवृत्ति की भूमिका रेखांकित की जाती रही है । स्नायविक और मानसिक असामान्यता का विवेचन साहित्य के प्रसंग में बहुतेरा होता रहा है । हिंदी में मनोवैज्ञानिक चित्रण की सुदीर्घ परम्परा को देखते हुए इस विद्या का परिचय विद्यार्थी की समझ का थोड़ा विस्तार ही करेगा ।
निर्धारित विषय:- 

  • मनोविज्ञान और साहित्य का समाजशास्त्र- चेतन, अचेतन और अवचेतन, इड, अहम और पराअहम, स्नायविक और मानसिक असामान्यता, मनोवैज्ञानिक चित्रण ।

सहायक पाठ्य सामग्री :-

  • मनोविश्लेषण, सिगमंड फ़्रायड (अनुवाद- देवेन्द्र वादत्त्कार), राजपाल एण्ड संस, दिल्ली, 2009 ।
  • कला का इतिहास दर्शन, आर्नल्ड हाउजर, ग्रंथशिल्पी, दिल्ली, 2003 (मनोविश्लेषण का अध्याय)।  

मॉड्यूल 4:  हिंदी साहित्य के भीतर सबसे नवीन आलोचनात्मक प्रवृत्ति अस्मिता विमर्श है । इसने साहित्य को लम्बे अरसे के बाद सामाजिक समूहों के संदर्भ में देखने की जरूरत पैदा की है । इन अस्मिताओं में समाज के बहुतेरे समुदायों ने अपनी साहित्यिक अभिव्यक्ति के जरिये अपनी मौजूदगी दर्ज की है । साहित्य के भीतर इस विमर्शपरक लेखन ने आत्मकथा को नयी भूमिका प्रधान की है । दलित और स्त्री लेखन ने पारम्परिक भाषा को अपने लिए अपर्याप्त मानकर उसके नये आयाम खोले हैं । 

निर्धारित विषय:-

  • अस्मितापरक लेखन और साहित्य का समाजशास्त्र- विमर्श और साहित्य, दलित, स्त्री, आदिवासी, किन्नर और विकलांग विमर्श, आत्मकथा की साहित्यिक सामाजिकता, भाषा की भूमिका, नारीवाद और साहित्य।  
     

सहायक पाठ्य सामग्री :-

  • विमर्श और आलोचना, प्रणय कृष्णा, सांस्कृतिक संकुल, इलाहाबाद, 2014 । 
  • दलित साहित्य: एक अंतर्यात्रा, बजरंग बिहारी तिवारी, नवारुण प्रकाशन, दिल्ली, 2020 ।
  • दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र – शरण कुमार लिम्बाले, लोक चेतना प्रकाशन, दिल्ली, 2016 ।
  • दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र – ओम प्रकाश वाल्मीकि, राधाकृष्ण प्रकाशन, 2008 ।  
  • किन्नर कथा- तीसरी दुनिया का सच- डॉ. एम्. फिरोज खान, विकास प्रकाशन, दिल्ली, 2016 
  • नारीवादी राजनीति: संघर्ष एवं मुद्दे, साधना आर्य, निवेदिता मेनन, जिनी लोकनीता, हिंदी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, 2014 
  • आत्मकथा की संस्कृति, पंकज चतुर्वेदी, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2011

Assessment (Including Skills to be tested as per NCrF):

  • Response Essay/PPT/Assignment-1 (25Marks)
  • Midterm Exam/PPT/Assignment-2/Project (25 Marks)
  • End Term Exam (50 Marks)
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