| Course Type | Course Code | No. Of Credits |
|---|---|---|
| Discipline Core | NSOL1MI207 | 4 |
Course Coordinator(s) डॉ.अनंत विजय पालीवाल
Does the course connect to, build on or overlap with any other courses offered in AUD? No
Specific requirements on the part of students who can be admitted to this course: None (Pre-requisites; prior knowledge level; any others – please specify)
No. of students to be admitted (with justification if lower than the usual cohort size is proposed): विश्वविद्यालय नियमानुसार
Course scheduling (semester; semester-long/half-semester course; workshop mode; seminar mode; any other – please specify): Semester long
How does the course link with the vision of AUD?
How does the course link to the specific programme(s) in which it is offered?
पाठ्यक्रम विवरण (Course Description)
यह पाठ्यक्रम विद्यार्थियों को सिनेमा में गीतों की यात्रा और और उनके विविध पक्षों को केंद्र में रखकर तैयार किया है। इस पाठ्यक्रम के जरिए विद्यार्थी ने क्वाल सिनेमा में अपितु भारतीय संस्कृति और हिंदी साहित्यमें उसके उद्गम और विस्तार से भी भली भांति परिचित हो सकेंगे। हिंदी सिनेमा में इन गीतों के प्रदर्शन से लेकर उसमें समय-समय पर आए बदलावों से भी विद्यार्थियों को अवगत कराया जाएगा। साहित्य की भांति सिनेमा भी सामाजिक और सांस्कृतिक बदलावों का न केवल आईना है बल्कि एक सशक्त माध्यम भी रहा है। अतः समाज में आए इन बदलावों को सिनेमाई गीतों के जरिए समझने और मूल्यांकन करने का प्रयास इस पाठ्यक्रम का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य होगा।
पाठ्यक्रम उद्देश्य (Course Objectives)
- यह पाठ्यक्रम विद्यार्थियों को गीतों की सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराते हुए उन्हें उसके समालोचनात्मक विश्लेषण के लिए तैयार करेगा।
- यह पाठ्यक्रम हिंदी साहित्य में गीत परम्परा के उद्गम, विस्तार और भारतीय संस्कृति में उसके आत्मसातीकरण की प्रक्रिया से विद्यार्थियों को परिचित कराएगा।
- हिंदी सिनेमा और भारतीय समाज के साथ गीतों की एक लम्बी ऐतिहासिक प्रक्रिया रही है। इसमें गीतों के जरिए विविध भाव अभिव्यक्तियाँ पाते रहे हैं। इन सभी भावों से विद्यार्थिओं को परिचित कराया जाएगा जिससे वे सामाजिक सरोकारों के प्रति सचेत बनें व उनके अंदर एक संवेदनात्मक भावना विकसित हो सके।
- हिंदी गीतों के सृजन में कुछ गीतकारों का विशेष महत्व रहा है। विभिन्न क्षेत्रों से आने के कारण इनके गीतों में उसकी महक महसूस की जा सकती है। अतः इन संगीतकारों के गीतों के जरिए भारतीय संस्कृति की उस महक में मौजूद विविधता को विश्लेषित करने का प्रयास किया जाएगा।
Course Outcomes:
- CO1: विद्यार्थी भारतीय संस्कृति में गीतों के महत्व और उसके विस्तार को जान सकेंगे।
- CO2: हिंदी साहित्य की विषद गीत-परम्परा से विद्यार्थी परिचित हो सकेंगे।
- CO3: हिंदी सिनेमा में गीतों के आरम्भ और पार्श्व गायन की कठिनाइयों को समझ सकेंगे।
- CO4: गीतों की शास्त्रीय और सामान्य शैली में अंतर को स्पष्ट कर सकेंगे।
- CO5: समाज का गीतों पर प्रभाव और गीतों द्वारा समाज पर पड़ने वाले प्रभाव को विश्लेषित कर सकेंगे।
- CO6: गीतों में आने वाले विविध विमर्शों और पक्षों के जरिए वे समाज में होने वाले बदलाव का मूल्यांकन कर सकेंगे।
Modules and Readings
गीत: एक परिचय
भारतीय संस्कृति में गीत अथवा गान की परंपरा वैदिक काल से मानी जाती है। चतुर्वेदों की अधिकतर वैदिक ऋचाएं गेय पदों अथवा सूक्तियों में ही हैं। श्रवण परंपरा के लिए गेयता एक आवश्यक विधान जैसा है, संभवतः इसीलिए भारतीय परंपरा में सम्पूर्ण ‘सामवेद’ ध्वनि और गान परंपरा को ही समर्पित है। कालांतर में काव्यशास्त्रीय आचार्यों ने भी ध्वनि को एक महत्वपूर्ण काव्य हेतु के रूप में स्थान देकर इसकी गीतात्मकता का ही समर्थन किया है। हिंदी साहित्य के समस्त रसों के परिपाक का आलंबन यह गीत ही हैं। सभी भावों का समुच्चय इन्हीं गीतों में निबद्ध है। आदिकाल में विद्यापति के गीतों ने लोक से लेकर आध्यात्मिक स्तर तक लोगों को प्रभावित किया। मध्यकाल में सूरदास, मीराबाई और तुलसी के छंद जनसमुदाय के कंठ से लेकर हृदय तक समाहित हो गए। वहीं रीतिकाल में आचार्यों इसे शास्त्रीय परम्परा में निबद्ध कर एक अलग ही वैभव प्रदान किया। यह गीत परंपरा आधुनिक काल में भी कभी सतह पर तो कभी अतः सलिला के रूप में बनी रही। यह मॉड्यूल विद्यार्थियों को गीतों की इसी महत यात्रा से परिचित कराएगा। साथ ही हिंदी सिनेमा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में गीतों के आविर्भाव से भी विद्यार्थियों को रूबरू कराया जाएगा।
निर्धारित पाठ:
- भारतीय संस्कृति और गीत
- हिंदी साहित्य में गीत परम्परा
- हिंदी सिनेमा में गीतों का आविर्भाव
सहायक पाठ्य सामग्री
- भारतीय संस्कृति शाश्वत जीवनदृष्टि एवं संगीत, डा. रुचि गुप्ता, कनिष्क पब्लिशर्स एवं डिस्ट्रीब्यूटर्स।
- हिंदी गीत काव्य, डॉ. ओमप्रकाश अग्रवाल, ई पुस्तकालय।
- आधुनिक गीत काव्य, सच्चिदानंद तिवारी, किताबमहल, इलाहाबाद।
- सिनेमा सप्तक, अनिरुद्ध शर्मा, सेतु प्रकाशन।
हिंदी सिनेमा में गीतों का विकास
हिंदी सिनेमा एक बहुआयामी, बहुविषयक प्लेटफॉर्म है जो मनोरंजन से लेकर समाज में घट रहे विभिन्न पहलुओं को दर्शाने का कार्य करता है। हिंदी सिनेमा के तमाम घटकों में गीत एक महत्वपूर्ण घटक है। अक्सर सिनेमा के मुख्य भावों को उभारने में इन गीतों का प्रमुख योगदान रहता है। संभवतः यही कारण है कि बिना गीतों के हम हिंदी सिनेमा की कल्पना भी नहीं कर पाते। हिंदी सिनेमा के आरंभिक दौर में पार्श गायन की एक समस्या रही है। इसे किस प्रकार संभव बनाया गया और कैसे बहुत शीघ्र इसने अपनी परिपक्वता प्राप्त की , इस मॉड्यूल के अंतर्गत विद्यार्थी इससे अवगत हो सकेंगे। आरंभिक हिंदी गीतों के शास्त्रीय पक्ष के साथ ही उसके साहित्यिक और सांस्कृतिक पक्ष पर विद्यार्थियों के साथ विस्तृत चर्चा की जाएगी।
निर्धारित पाठ:
- हिंदी सिनेमा में पार्श्व गायन का विकास
- आरंभिक हिंदी गीतों में शास्त्रीय पक्ष
- आरंभिक हिंदी गीतों में साहित्य और सांस्कृतिक पक्ष
सहायक पाठ्य सामग्री
- हिंदी सिनेमा के कालजयी गीतकार, डॉ. शालिनि सिंह, निखिल पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स।
- राजगीरी, शिवेंद्र कुमार सिंह व गिरिजेश कुमार, प्रभात प्रकाशन।
- फिल्मी शास्त्रीय गीत, पं. हरिश्चंद्र श्रीवास्तव, संगीत सदन प्रकाशन, इलाहाबाद।
हिंदी गीतों का बदलता स्वरूप:
अपनी यात्रा में हिंदी सिनेमा कई बदलावों से गुजरा है। 1950 से 1970 के दो दशक रोमांटिक सिनेमा के दौर के रूप में याद किया जाता है। देव आनंद, राजकपूर, दिलीप कुमार, राजेंद्र कुमार, शम्मी कपूर से लेकर राजेश खन्ना तक हिंदी गीतों का एक अलग ही खुमार दर्शकों पर देख जा सकता है। वहीं 70 के दशक के बाद मनोरंजन सिनेमा से लेकर समानांतर सिनेमा सिनेमा तक आमजन की समस्याएं और आक्रोश मुख्य विषय के रूप में उभरने लगे। अमिताभ बच्चन जैसे कलाकारों में जहां युवा अपने क्रोध और आवेश को ढूंढ रहा था वहीं अमोल पालेकर, गिरीश कर्नाड, स्मिता पाटिल, नसीरुद्दीन शाह और फारूख शेख जैसे कलाकारों में आमजन अपनी व्यक्तिगत सामाजिक समस्याओं को महसूस कर पा रहा था। ऐसे में गीतों का स्वर बदलना भी लाजिमी था। इस दौर में अधितर हिंदी गीतों में सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ मुखर हो कर आया है। इस मॉड्यूल में छात्र सिनेमाई गीतों में आए इस बदलाव को विस्तार से समझेंगे।आजादी के बाद हुए तमाम युद्धों से सिनेमा जगत भी अछूता नहीं रहा। जनता के मनोभावों में बसी राष्ट्रवादी चेतना को समझते हुए तमाम गीतकारों ने राष्ट्रीय चेतना के गीत लिखे । सिनेमा की वजह से ये गीत लोकमान में अमर से ही गए, जिन्हें अब भी ऐसे किसी मौके पर उसी शिद्दत से याद किया जाता है। विद्यार्थियों को इस मॉड्यूल के जरिए राष्ट्रवादी गीत और गीतकारों के इस अभूतपूर्व योगदान से परिचित कराया जाएगा।
निर्धारित पाठ:
- रोमांटिक सिनेमा का दौर और हिंदी गीत
- युवा आक्रोश और गीतों को बदलता स्वरूप
- हिंदी गीतों में सामा- राजनीतिक मुद्दे
- राष्ट्रवादी चेतना के गीत
सहायक पाठ्य सामग्री
- फिल्मी राष्ट्रीय गीत अंक, लक्ष्मी नारायण गर्ग, संगीत कार्यालय हाथरस।
- हिंदी सिनेयात्रा:सिनेमा और राष्ट्रवाद, प्रो. रमा, नई किताब, दिल्ली।
- फिल्मी गीतों में झांकता भारत, अंकुर भारद्वाज,सीमा चिश्ती,सुशांत, पेंगुइन प्रकाशन।
हिंदी सिनेमा में गीतों के विविध पक्ष
यह विदित है कि हिंदी सिनेमा में गीतों का फलक बहुत व्यापक है। तमाम तरह इसे वर्गीकृत करने का प्रयास भी किया गया है, फिर भी ऐसे कई विषय है जिन्हें किसी काल विशेष अथवा विषय के अंतर्गत बांधा नहीं जा सकता। अतः ऐसे विषयों को कुशलच विशेष ढांचों के नर्तगत रखकर देखा जा सकता है। इस मॉड्यूल में विद्यार्थियों को सिनेमा के इन्हीं विविध पक्षों से अवगत कराया जाएगा।
निर्धारित पाठ:
- गजल से लेकर लोक- चेतना के गीत
- बाल-संवेदना के गीत
- मानवेतर / प्रकृतिपरक गीत
सहायक पाठ्य सामग्री
- हिंदी गजल की भूमिका, शिव शंकर मिश्रा, लिटिल बर्ड पब्लिकेशन।
- हिंदी गजल का निकष, प्रो.वशिष्ठ अनूप, वाणी प्रकाशन।
- फिल्मी बाल गीत अंक, लक्ष्मी नारायण गर्ग, संगीत कार्यालय, हाथरस।
- "वनगीत: प्रकृति के प्रति बॉलीवुड की श्रद्धांजलि" लेख (Sylvan Songs - Bollywood’s Ode to Nature): ', दीपक महान, द हिंदू।
Assessment (Including Skills to be tested as per NCrF):
- Response Essay/PPT/Assignment-1 ( 25Marks)
- Midterm Exam/PPT/Assignment-2/Project (25 Marks)
- End Term Exam (50 Marks)
डॉ. बी. आर. अम्बेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली