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अस्मितामूलक विमर्श और हिंदी साहित्य

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Course Type Course Code No. Of Credits
Discipline Core NSOLDS1DS002 4

Course Coordinator(s) :      Prof. Gopal Ji Pradhan

1. Does the course connect to, build on or overlap with any other courses offered in AUD? No

2. Specific requirements on the part of students who can be admitted to this course: None (Pre-requisites; prior knowledge level; any others – please specify)

3. No. of students to be admitted (with justification if lower than the usual cohort size is proposed): विश्वविद्यालय नियमानुसार

4. Course scheduling (semester; semester-long/half-semester course; workshop mode; seminar mode; any other – please specify): Semester long

5. How does the course link with the vision of AUD?

6. How does the course link to the specific programme(s) in which it is offered?

पाठ्यक्रम विवरण (Course Description)

यह पाठ्यक्रम 1990 के दशक के पश्चात उत्पन्न सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तनों के संदर्भ में हिंदी साहित्य में विकसित अस्मितामूलक विमर्शों के अध्ययन पर केंद्रित है। नवउदारीकरण, वैश्वीकरण एवं निजीकरण की प्रक्रियाओं ने समाज की संरचना, वर्ग-चेतना तथा सांस्कृतिक दृष्टि को गहराई से प्रभावित किया, जिसके परिणामस्वरूप विभिन्न नई अस्मिताओं का उदय हुआ। यह पाठ्यक्रम विद्यार्थियों को उत्तरआधुनिकता, उत्तरसंरचनावाद एवं विखंडनवाद जैसे सैद्धांतिक प्रतिमानों के माध्यम से अस्मिता-विमर्शों की समझ विकसित करने का अवसर प्रदान करता है। इसके अंतर्गत दलित, स्त्री, आदिवासी एवं अन्य हाशियागत समुदायों से संबंधित साहित्यिक अभिव्यक्तियों का अध्ययन किया जाएगा। पाठ्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों में साहित्य को सामाजिक यथार्थ, सत्ता-संरचनाओं एवं सांस्कृतिक प्रक्रियाओं के संदर्भ में समझने की आलोचनात्मक दृष्टि विकसित करना है, जिससे वे समकालीन हिंदी साहित्य में उभरते विमर्शों का विश्लेषण, मूल्यांकन एवं व्याख्या कर सकें।

पाठ्यक्रम उद्देश्य (Course Objectives)

  • नवउदारीकरण के पश्चात सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तनों को समझने की क्षमता विकसित करना।
  • अस्मितामूलक विमर्शों के उद्भव एवं उनके सैद्धांतिक आधार को स्पष्ट करना।
  • उत्तरआधुनिकता, उत्तरसंरचनावाद एवं विखंडनवाद जैसे सिद्धांतों से विद्यार्थियों को परिचित कराना।
  • दलित, स्त्री एवं आदिवासी साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियों का अध्ययन करना।
  • साहित्यिक पाठों के माध्यम से अस्मिता, प्रतिरोध एवं सामाजिक न्याय के प्रश्नों को समझना।
  • आलोचनात्मक एवं तुलनात्मक अध्ययन के माध्यम से विद्यार्थियों में विश्लेषणात्मक दृष्टि विकसित करना।

इस पाठ्यक्रम के सफल समापन के बाद विद्यार्थी सक्षम होंगे:

  • CO1: विद्यार्थी 1990 के दशक के पश्चात नवउदारीकरण, वैश्वीकरण एवं सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों की प्रक्रिया को समझ सकेंगे, उसका वर्णन कर सकेंगे तथा हिंदी साहित्य पर उसके प्रभावों की व्याख्या कर सकेंगे।
  • CO2: विद्यार्थी अस्मितामूलक विमर्शों के उद्भव, विकास एवं उनके ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भों का विश्लेषण कर सकेंगे तथा उनके सैद्धांतिक आधार को स्पष्ट कर सकेंगे।
  • CO3: विद्यार्थी उत्तरआधुनिकता, उत्तरसंरचनावाद एवं विखंडनवाद जैसे प्रमुख सैद्धांतिक प्रतिमानों की अवधारणाओं को समझ सकेंगे तथा साहित्यिक पाठों के विश्लेषण में उनका प्रयोग कर सकेंगे।
  • CO4: विद्यार्थी दलित, स्त्री एवं आदिवासी विमर्श से संबंधित चयनित साहित्यिक कृतियों (कविता, कहानी, आत्मकथा आदि) का सूक्ष्म पाठ-विश्लेषण कर सकेंगे, तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत कर सकेंगे तथा उनमें निहित अस्मिता, प्रतिरोध एवं सामाजिक यथार्थ को स्पष्ट कर सकेंगे।
  • CO5: विद्यार्थी विभिन्न अस्मितामूलक विमर्शों में व्यक्त सामाजिक न्याय, समानता, पहचान एवं प्रतिरोध के प्रश्नों का मूल्यांकन कर सकेंगे तथा समकालीन संदर्भों में उनकी प्रासंगिकता का आलोचनात्मक विवेचन कर सकेंगे।
  • CO6: विद्यार्थी अस्मितामूलक साहित्य के अध्ययन के आधार पर आलोचनात्मक एवं सृजनात्मक अभिव्यक्ति प्रस्तुत कर सकेंगे, तथा सामाजिक-सांस्कृतिक प्रश्नों पर सुव्यवस्थित अकादमिक लेखन एवं प्रस्तुतीकरण कर सकेंगे।

Modules and Readings

मॉड्यूल 1 (Lecture Hours =16 )  अस्मिताविमर्श संबंधी सैद्धांतिकी

इस इकाई में विद्यार्थी अस्मिताविमर्श के ऐतिहासिक कारणों को जान सकेंगे। ‘अस्मिता’ का संबंध नवउदारीकरण और निजीकरण से है। सोवियत संघ के विघटन, शीतयुद्ध की समाप्ति तथा उदारीकरण के पश्चात विश्व आर्थिक विकेन्द्रीकरण की ओर बढ़ा। तीसरी दुनिया शीतयुद्ध के गहन प्रभाव से बाहर निकल अपनी पहचान गढ़ने लगी। संपत्ति के साथ साथ मध्यवर्ग में भी विस्तार हुआ। बाज़ार एवं मध्यवर्ग एक दूसरे के पूरक बनने लगे। संपत्ति की परिधि में नये विचार और अस्मिताएं पनपने लगीं। इन अस्मिताओं के केंद्र में था- मध्यवर्ग। मध्यवर्ग की सामूहिक अभिव्यक्ति से अस्मिताओं के निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। आत्मकथाओं ने अस्मिताविमर्श के साहित्यिक दरवाजे खोल दिये। इस मॉड्यूल के अंतर्गत इन्हीं प्रश्नों से विद्यार्थी परिचित होंगे।

निर्धारित विषय:

  • अस्मितामूलक विमर्श की सैद्धांतिकी
  • अस्मिता का अर्थ और उसका इतिहास
  • अस्मिता के सिद्धांत- उत्तरआधुनिक, उत्तरसंरचनावाद, विखंडनवाद का सामान्य परिचय

Suggested Readings:

  • संरचनावाद, उत्तरसंरचनावाद और प्राच्य काव्यशास्त्र, गोपीचंद नारंग, साहित्य अकेडमी, 2000.
  • हिन्दी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली, डॉ. अमरनाथ, राजकमल प्रकाशन, 2012.
  • आधुनिक हिन्दी आलोचना के बीज शब्द, बच्चन सिंह, वाणी प्रकाशन, 2015.

माड्यूल 2 (Lecture Hours =16 ) दलित, दलित अस्मिता, दलित विमर्श और दलित साहित्य

इस मॉड्यूल के अंतर्गत विद्यार्थी दलित, दलित अस्मिता, दलित विमर्श और दलित साहित्य की धारणाओं तथा उनसे जुड़े इतिहास के बारे में पढ़ सकेंगे। ‘दलित’ शब्द के अनेक अर्थ ग्रहण किया जाते हैं- एक अर्थ, ‘दलन’ या ‘दमन’ से जुड़ा है; एक, ‘अस्पृश्यता’ से और एक ‘अनुसूचित जाति’ से। आरंभ में दलित शंब्द का अर्थ ‘अनुसूचित जाति’ ही स्वीकार किया जाता रहा है। बाबा साहब अंबेडकर इस शब्द का प्रयोग करते थे। मार्टिन लूथर किंग की ‘ब्लैक पैंथर की तर्ज़ पर बना महाराष्ट्र का ‘दलित पैंथर’ हर शोषित वर्ग या जाति के लिये सक्रिय एक सामाजिक-राजनीतिक संगठन था। भूमिहीन किसानों से लेकर शहरी मजदूर वर्ग की सुरक्षा एवं अधिकारों की चिंता यह संगठन करता रहा। ‘दलित पैंथर’ के यहाँ ‘दलित’ शंब्द का पहला अर्थ ही ज्यादा सार्थक रहा। समय के साथ ‘दलित’ की परिभाषा बदलती रही, जिसे हम इस मॉड्यूल में पढ़ेंगे। दलित इतिहास में मराठी इतिहास, साहित्य और साहित्यकारों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इसी कारण बहुधा हिन्दी के दलित साहित्य को ‘मराठी दलित साहित्य की कलम’ भी कहा गया।  इस मॉड्यूल के अंतर्गत दलित विचारकों एवं उनके योगदान पर भी चर्चा की जाएगी। दलित साहित्य के अंतर्गत दलित आत्मकथा, कहानी, कविता, आलोचना और पत्रकारिता आदि विषयों पर भी बात की जाएगी।

निर्धारित विषय:

  • दलित: अवधारणा और इतिहास
  • साहित्यिक अभिव्यक्ति- आत्मकथा- जूठन (ओमप्रकश वाल्मीकि)
  • कविता- दलित कहाँ तक पड़े रहेंगे (अछूतानंद), दलित विमर्श (कालीचरण सनेही)
  • कहानी- नौ बार (जयप्रकाश कर्दम)

Suggested Readings:

  • दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र, ओमप्रकाश वाल्मीकि, राधाकृष्ण प्रकाशन, 2014
  • ओमप्रकाश वाल्मीकि, जूठन
  •  कांचा इलैया, Why I am not a Hindu, Samya

 

माड्यूल3 (Lecture Hours = 16) स्त्री विमर्श और साहित्यिक अभिव्यक्ति

हिंदी साहित्य में स्त्री लेखिकायें पहले भी रही हैं, किंतु 90’ के दशक के बाद से बड़े पैमाने पर स्त्री लेखन का उभार हुआ । इस लेखन में अपनी विरासत का परिष्कार और संवर्धन के अतिरिक्त समसामयिक विषयों पर लगभग प्रत्येक विधा में प्रचुर लेखन हुआ है। इस लेखन में नारीवाद की सैद्धांतिकी की अनुगूंजें तो हैं ही; स्त्री की बदलती सामाजिक अवस्था से उत्पन्न चुनौतियों और सवालों की भी भरपूर उपस्थिति नज़र आती है। इस मॉड्यूल में हम इन्हीं विषयों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

निर्धारित विषय:

  • स्त्री विमर्श: अवधारणा और मुक्ति आंदोलन का इतिहास (भारत और पश्चिम के संदर्भ)
  • साहित्यिक अभिव्यक्ति- आत्मकथा-अन्या से अनन्या (प्रभा खेतान), पृष्ठ-28 से 42 तक
  • कविता- सीमा रेखा (कीर्ति चौधरी), सात भाइयों के बीच चंपा (कात्यायनी)
  • कहानी- व्यक्तित्व की भूख (सुमित्रा कुमारी सिन्हा)

Suggested Readings:

  • उपनिवेश में स्त्री, प्रभा खेतान, राजकमल प्रकाशन, 2003.
  • श्रृंखला की कड़ियाँ, महादेवी वर्मा, लोकभारती प्रकाशन, 2008.
  •  प्रभा खेतान, उपनिवेश में स्त्री, राजकमल, 2003
  • सिमोन द बोउवार, स्त्री उपेक्षिता

माड्यूल 4 (Lecture Hours =16 ) आदिवासी और अन्य अस्मिताएं: सैद्धांतिक और साहित्यिक विमर्श

नवउदारीकरण के आगमन के साथ ही जो समुदाय पहले से ही हाशिये पर थे, उनका हाशियाकरण और तीव्र हुआ है। संसाधनों पर निजी पूंजी के कब्ज़े और विकास की लोकप्रिय परियोजना के प्रसार ने आदिवासी समुदायों को वंचना की अनुभूति कराई। साथ ही इसी दौर में आये विमर्श भी तेजी के साथ रंगपटल पर उभरे हैं। इनमें किन्नर विमर्श, एलजीबीटीक्यू विमर्श और विकलांग विमर्श जैसी कुछ नूतन कोटियों का उभार हुआ है, जो साहित्य की दुनिया में अपना प्रतिनिधित्व दर्ज कर रही हैं।

निर्धारित विषय:

  • हाशिये का निर्माण और विमर्श की दावेदारी
  • आदिवासी साहित्य और विमर्श- उपन्यास- धूणी तपे तीर (हरिराम मीणा), पृष्ठ-158 से 167 तक
  • कविता- आदिवासी लड़कियों के बारे में (निर्मला पुतुल), चूल्हों की दुनिया (अनुज लुगुन)
  •  कहानी- प्रवास का महीना (हांसदा सौभेंद्र शेखर)

Suggested Readings:

  • आदिवासी विश्व चेतना, महादेव टोप्पो, अनुज्ञा बुक्स, 2021
  • हरिराम मीणा, धूणी तपे तीर, वाणी प्रकाशन

Assessment (Including Skills to be tested as per NCRF):

  • Response Essay/ Assignment-1  (25 Marks)
  • Midterm Exam/PPT/Assignment-2 (25 Marks)
  • End Term Exam (50 Marks)
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