| Course Type | Course Code | No. Of Credits |
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| Foundation Core | NSOL1HN101 | 4 |
Semester and Year Offered: 1st
Course Coordinator and Team: Prof. Satyaketu Sankrit
- Does the course connect to, build on or overlap with any other courses offered in AUD? No
- Specific requirements on the part of students who can be admitted to this course: None (Pre-requisites; prior knowledge level; any others – please specify)
- No. of students to be admitted (with justification if lower than the usual cohort size is proposed): विश्वविद्यालय नियमानुसार
- Course scheduling (semester; semester-long/half-semester course; workshop mode; seminar mode; any other – please specify): Semester long
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How does the course link with the vision of AUD? - यह पाठ्यक्रम आधुनिक हिंदी कविता के अध्ययन के माध्यम से विद्यार्थियों में आलोचनात्मक, मानवीय एवं बहुविषयक दृष्टि का विकास करता है। आधुनिकता, राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक परिवर्तन तथा मानवीय मूल्यों से जुड़े प्रश्नों की काव्यात्मक अभिव्यक्तियों को समझते हुए विद्यार्थी साहित्य, समाज और संस्कृति के अंतर्संबंधों का विश्लेषण कर सकेंगे। इस प्रकार प्रस्तुत पाठ्यक्रम विद्यार्थियों को संवेदनशील, लोकतांत्रिक और वैचारिक रूप से सजग नागरिक बनने की दिशा में प्रेरित करता है। |
How does the course link to the specific programme(s) in which it is offered?
प्रस्तुत पाठ्यक्रम बी.ए. (ऑनर्स) हिंदी कार्यक्रम में आधुनिक हिंदी कविता की प्रमुख काव्यधाराओं, प्रवृत्तियों तथा वैचारिक आधारों के अध्ययन को सुदृढ़ करता है। यह विद्यार्थियों को खड़ी बोली हिंदी के काव्यभाषा के रूप में विकास, राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक चेतना की काव्यात्मक अभिव्यक्तियों तथा छायावाद, प्रगतिवाद और प्रयोगवाद जैसी काव्य प्रवृत्तियों की समझ प्रदान करता है। साथ ही, यह पाठ्यक्रम विद्यार्थियों में काव्य-पाठ के विश्लेषण, आलोचनात्मक व्याख्या, अकादमिक लेखन तथा साहित्यिक संवेदनशीलता की क्षमता विकसित करने में सहायक है।
पाठ्यक्रम विवरण (Course Description)
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हिंदी की विशाल काव्य-राशि बनती-बदलती रही है परंतु आधुनिकता के आगमन, खड़ी बोली के साहित्यिक भाषा के रूप में विकसित होने, और राष्ट्र की अवधारणा के साथ उसकी संगति विद्वानों के अनुसार लगभग 1850 से मानी जा सकती है। भारतेंदु हरिश्चंद की अगुवाई में पहली बार खड़ी बोली को नयी विधाओं और स्वरों में ढाला गया। यह पुरानी ब्रज काव्य-भाषा और परंपरा से खड़ी बोली में संक्रमण था। ब्रज काव्य-परंपरा की रीति बंधी प्रणाली और वैचारिकी से कविता बाहर आयी क्योंकि ब्रज अब नए जमाने के प्रश्नों और चुनौतियों का वहन करने में सक्षम न थी। यह पाठ्यक्रम खड़ी बोली के उसी आरम्भिक दौर की कविताओं से शुरू होकर राष्ट्र-निर्माण के विभिन्न प्रश्नों से जूझती कविताओं को अपने में सम्मिलित करता है। साथ ही यह पाठ्यक्रम छायावाद और छायावादोत्तर कविताओं का अध्ययन भी करता है जिसके सहारे विद्यार्थी उस दौर की कविता में वैयक्तिकता के उभार, प्रकृति-प्रेम, सांस्कृतिक जागरण, स्वच्छंदता व कल्पना आदि मूल्यों की समझ विकसित कर सकेंगे। |
इस पाठ्यक्रम के अध्ययन से विद्यार्थी अपनी साहित्यिक काव्य परंपरा का बोध विकसित कर सकेंगे। खड़ी बोली के काव्यभाषा के रूप में विकसित होने की प्रक्रिया समझ सकेंगे। वे राष्ट्रीय व सांस्कृतिक जागरण की काव्यात्मक अभिव्यक्तियों से परिचय हासिल कर सकेंगे। साथ ही वे हिंदी की आधुनिक कविता को रूपाकार देने वाले छायावादी कवियों की कविताओं के अध्ययन के सहारे तत्कालीन समय-समाज में व्याप्त वैचारिक आलोड़नों का विश्लेषण करने में भी सक्षम हो सकेंगे।
पाठ्यक्रम उद्देश्य (Course Objectives)
यह पाठ्यक्रम विद्यार्थियों को आधुनिक हिंदी कविता के विकासक्रम, उसकी प्रमुख काव्य प्रवृत्तियों तथा आधुनिक हिंदी कविता की वैचारिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से परिचित कराने के उद्देश्य से निर्मित है। इसके माध्यम से विद्यार्थी खड़ी बोली हिंदी के काव्यभाषा के रूप में विकास, राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक जागरण की काव्यात्मक अभिव्यक्तियों तथा छायावाद, प्रगतिवाद और प्रयोगवाद जैसी प्रमुख काव्यधाराओं की विशेषताओं को समझ सकेंगे। साथ ही, यह पाठ्यक्रम विद्यार्थियों में कविता के सौंदर्यबोध, विश्लेषणात्मक क्षमता, आलोचनात्मक दृष्टि तथा आधुनिक हिंदी कविता के सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों की व्याख्या करने की योग्यता विकसित करने पर बल देता है।
- CO1: विद्यार्थी खड़ी बोली हिंदी के काव्यभाषा के रूप में विकसित होने की प्रक्रिया तथा आधुनिक हिंदी कविता के आरंभिक स्वरूप को समझ सकेंगे।
- CO2: विद्यार्थी राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक जागरण से संबंधित काव्यात्मक अभिव्यक्तियों का विश्लेषण कर सकेंगे तथा आधुनिक हिंदी कविता की वैचारिक पृष्ठभूमि को स्पष्ट कर सकेंगे।
- CO3:विद्यार्थी छायावादी कविता की प्रमुख प्रवृत्तियों, जैसे प्रकृति-प्रेम, स्वच्छंदता, व्यक्तिवाद, कल्पनाशीलता एवं सांस्कृतिक चेतना का आलोचनात्मक अध्ययन कर सकेंगे।
- CO4:विद्यार्थी प्रगतिशील एवं प्रयोगवादी कविता में सामाजिक यथार्थ, लोकचेतना, व्यक्ति–समाज संबंध तथा आधुनिक जीवन की जटिलताओं का विश्लेषण कर सकेंगे।
- CO5:विद्यार्थी आधुनिक हिंदी कविता के विभिन्न काव्यरूपों, भाषा, बिंब, प्रतीक तथा संवेदनात्मक संरचना का तुलनात्मक मूल्यांकन कर सकेंगे।
- CO6:विद्यार्थी कविता के अध्ययन के आधार पर स्वतंत्र आलोचनात्मक लेखन, व्याख्या तथा अकादमिक प्रस्तुतीकरण करने में सक्षम होंगे।
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Modules and Readings In this section, provide the name of the modules along with a brief description and references (Core and Suggested) |
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मॉड्यूल1 (Lecture Hours = ) 16 |
भारतेंदु युग और द्विवेदी युग की कविताएँ हिंदी कविता के इतिहास में भारतेंदु युग (1850-1900) पुरानी ब्रज भाषा कविता से खड़ी बोली काव्य में संक्रमण के लिए जाना जाता है। अन्य आधुनिक विधाओं की तरह कविता में भी भारतेंदु इस संक्रमण भूमि पर खड़े हैं और आधुनिकता की तरह बढ़ते दीखते हैं। वे ब्रजभाषा, उर्दू और खड़ी बोली, तीनों में कविता करते हैं पर उनका झुकाव खड़ी बोली की तरफ ही है। इसी दौर में ब्रज भाषा कविता के दरबारीपने, रूढ़ियों और बंधी-बँधाई चाल से निकलकर हिंदी कविता 'नयी चाल में ढली'। राष्ट्रीयता की भावना भी इस युग की कविताओं में दीखने लगती है। द्विवेदी युग (1900-1918) तक आते-आते हिंदी कविता अपने समय की सामाजिक-सांस्कृतिक सच्चाइयों को और अधिक बल के साथ अभिव्यक्ति देने लगती है। मिथकों की पुनर्व्याख्या के साथ ही सामान्य जन जीवन के कष्ट भी कविता के विषय बनने शुरू होते हैं। राष्ट्रीयता के उभार के साथ ही भारतीयता को पहचानने-व्याख्यायिय करने की चुनौती उस दौर की कविताओं में दिखने लगती है। मिथकों की पुनर्व्याख्या के सहारे एक ओर उस दौर के कवि-बुद्धिजीवी तत्कालीन बर्तानवी हुकूमत के सांस्कृतिक दबदबे को चुनौती दे रहे थे वहीं दूसरी ओर भारतीय समाज और संस्कृति के तमाम पिछड़े हुए पहलुओं में सुधार कार्य का बीड़ा भी वे अपनी कविताओं के कंधे पर उठाए हुए थे। निर्धारित विषय : 1. भारतेंदु: 'चुनिंदा दोहे', 'नए जमाने की मुकरी', 'हरी हुई भूमि सब' 2. हरिऔध: 'हम और तुम', 'कर्मवीर' 3. मैथिलीशरण गुप्त: 'साकेत अष्टम सर्ग से चुनिंदा अंश' 4. रामनरेश त्रिपाठी: 'अतुलनीय जिसके प्रताप का' सहायक पाठ्य सामग्री एवं पुस्तकें :- · कृष्णदत्त पालीवाल (सं.), भारतेंदु प्रतिनिधि रचनाएँ, सचिन प्रकाशन, नई दिल्ली, 1987। · मैथिलीशरण गुप्त, साकेत, साहित्य सदन, झाँसी। · मैथिलीशरण गुप्त, भारत-भारती, साहित्य सदन, झाँसी। · रामविलास शर्मा, भारतेन्दु युग और हिंदी भाषा की विकास परंपरा, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली। · नामवर सिंह, आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ, लोकभारती प्रकाशन, प्रयागराज। |
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माड्यूल 2 (Lecture Hours = ) 16 Hours |
छायावाद हिंदी कविता के इतिहास में 1918 से 1936 तक के समय को छायावाद संज्ञा से अभिहित किया जाता है। हिंदी आधुनिक कविता इस काल में अपनी पूर्ववर्ती कविता से सीखते हुए व्यवस्थित होती है। इस व्यवस्था में भाषा की व्यवस्था के साथ भावों की व्यवस्था भी शामिल है। इस दौर के कवियों पर स्वच्छंदतावाद, रहस्यवाद व बांग्ला कविता का गहरा असर आलोचकों ने चिन्हित किया है। राष्ट्रीय सांस्कृतिक जागरण की चली आ रही काव्य-परंपरा इस दौर में आगे बढ़ती ही है, साथ ही प्रकृति के साथ इस दौर के कवि नए तरह का सम्बंध विकसित करते हैं। इस दौर की कविता में 'व्यक्ति' की प्रधानता भी देखी जा सकती है जिसे निराला 'मैंने मैं शैली अपनाई' जैसी कविताओं के सहारे अभिव्यक्त करते हैं। कल्पना प्रवणता इस दौर की कविता का एक और विशिष्ट गुण है। नए सिरे से स्त्री-छवि और प्रेम का निर्माण भी इस दौर की कविताओं की प्रमुख प्रवृत्ति है। जयशंकर प्रसाद व अन्य कवियों ने इस दौर की कविता में दार्शनिकता के नए आयाम दिए। निर्धारित विषय: 1. प्रसाद: 'बीती विभावरी जाग री', 'अरूण यह मधुमय देश हमारा' 2. पंत: 'ताज' और 'छोड़ द्रुमों की मृदु छाया' 3. निराला: 'बादल राग-6' और 'बांधो न नाव इस ठाँव बंधु' 4. महादेवी: 'पंथ होने दो अपरिचित', और 'मधुर मधुर मेरे दीपक जल' सहायक पाठ्य सामग्री एवं पुस्तकें :- · जयशंकर प्रसाद, कामायनी, लोकभारती प्रकाशन, प्रयागराज। · सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, राग-विराग (सं. रामविलास शर्मा), लोकभारती प्रकाशन। · सुमित्रानंदन पंत, पल्लव, लोकभारती प्रकाशन। · महादेवी वर्मा, यामा, लोकभारती प्रकाशन। · नामवर सिंह, छायावाद, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली। |
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माड्यूल 3 (Lecture Hours = ) 16 hours |
प्रगतिशील कविता इस मॉड्यूल में केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, त्रिलोचन और मुक्तिबोध की कविताओं का अध्ययन किया जायेगा। इन सभी कवियों का संबंध प्रगतिशील आंदोलन से है लेकिन इनकी कविताओं में उनका अपना क्षेत्र रचा-बसा हुआ है। केदारजी की कविता केन नदी और बांदा से अपनी जीवनीशक्ति हासिल करती है तो नागार्जुन की कविता मिथिला के अंचल से। त्रिलोचन की कविताओं में अवध का जीवन सांस ले रहा है तो मुक्तिबोध की कविताओं में मालवा के पठार और घाटियां अपने भूगोल के साथ उपस्थित हैं। ये कवि प्रगतिशीलता की विचारधारा को अपने लोक की भूमि पर स्थापित करते हैं। मुक्तिबोध की कवितायें 'तार सप्तक' में प्रकाशित हुई थीं लेकिन बाद में उनकी कविताओं की संरचना और स्वर भिन्नतर होता चला गया। निर्धारित विषय : 1. केदार नाथ अग्रवाल - बसंती हवा, आज नदी बिलकुल उदास थी 2. नागार्जुन - उनको प्रणाम, कालिदास सच सच बतलाना 3. त्रिलोचन - चंपा काले-काले अक्षर नहीं चीन्हती, तुलसी बाबा 4. गजानन माधव मुक्तिबोध - मुझे कदम-कदम पर, सहर्ष स्वीकारा है सहायक पाठ्य सामग्री एवं पुस्तकें :- · नागार्जुन, प्रतिनिधि कविताएँ, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली। · केदारनाथ अग्रवाल, प्रतिनिधि कविताएँ, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली। · त्रिलोचन, प्रतिनिधि कविताएँ, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली। · गजानन माधव मुक्तिबोध, चाँद का मुँह टेढ़ा है, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली। · मुक्तिबोध, नई कविता का आत्मसंघर्ष तथा अन्य निबंध, राजकमल प्रकाशन। |
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माड्यूल 4 (Lecture Hours = ) 16 hours |
प्रयोगवाद और नई कविता हिंदी कविता के इतिहास में प्रयोगवाद एक महत्वपूर्ण काव्य प्रवृत्ति के रूप में स्थापित है। अज्ञेय न सिर्फ इस काव्य प्रवृत्ति के प्रतिनिधि रचनाकार हैं बल्कि वे प्रयोगवाद के सिद्धांतकार भी हैं। व्यक्ति और समाज के संबंधों पर व्यक्ति की स्वतंत्रता के बारे में उनके विचार कविता और आलोचनात्मक लेखों में मौजूद हैं। आधुनिक हिंदी कविता के इतिहास में 'तार सप्तक' का प्रकाशन एक महत्वपूर्ण घटना है। इसके जरिये अज्ञेय ने हिंदी कविता की नयी दिशा को पहचानने और एक हद तक नयी दिशा देने की भी कोशिश की। भवानी प्रसाद मिश्र 'दूसरा सप्तक' में प्रकाशित कवि हैं। उनकी कविताओं और जीवन दोनों में गांधी विचार और दर्शन की स्पष्ट छाप दिखाई पड़ती है। शमशेर बहादुर सिंह की कवितायें ऐंन्द्रियता, सांकेतिकता और चित्रात्मकता के लिहाज से विशिष्ट हैं। उर्दू और हिंदी में समान गति होने के कारण उन्हें हिंदी और उर्दू का दोआब भी कहा जाता है। इस मॉड्यूल में इन तीनों कवियों की निर्धारित कविताओं का अध्ययन किया जायेगा। निर्धारित विषय : 1. सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'- कलगी बाजरे की, हरी घास पर क्षण भर 2. भवानी प्रसाद मिश्र- सतपुड़ा के जंगल, चार कौए उर्फ चार हौए 3. शमशेर बहादुर सिंह - निराला के प्रति, तड़पती हुई से ग़ज़ल कोई लाये सहायक पाठ सामग्री एवं पुस्तकें :- · अज्ञेय (सं.), तार सप्तक, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली। · शमशेर बहादुर सिंह, कुछ कविताएँ, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली। · भवानी प्रसाद मिश्र, बुनी हुई रस्सी, किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली। · विश्वनाथ त्रिपाठी, आधुनिक हिंदी कविता, लोकभारती प्रकाशन। · विजयदेवनारायण साही, छठवाँ दशक, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली। · बच्चन सिंह, आधुनिक हिंदी साहित्य का इतिहास, लोकभारती प्रकाशन। · नंदकिशोर नवल, आधुनिक हिंदी कविता का इतिहास, वाणी प्रकाशन। · रामस्वरूप चतुर्वेदी, हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, लोकभारती प्रकाशन। |
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डॉ. बी. आर. अम्बेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली