| Course Type | Course Code | No. Of Credits |
|---|---|---|
| Discipline Core | NSOL1MI206 | 4 |
Course Coordinator(s) RUBINA SAIFE
पाठ्यक्रम विवरण (Course Description)
'हिंदी सिनेमा और समकालीन विमर्श' पाठ्यक्रम स्नातक स्तर के विद्यार्थियों के लिए तैयार किया गया है, जिसका मुख्य उद्देश्य सिनेमा को मात्र मनोरंजन की वस्तु न मानकर उसे एक गंभीर सामाजिक और वैचारिक पाठ (Text) के रूप में विश्लेषित करना है। यह पाठ्यक्रम छात्र/छात्राओं को सिनेमाई भाषा के माध्यम से समाज के बदलते स्वरूप और उभरते हुए विमर्शों को समझने की एक आलोचनात्मक दृष्टि प्रदान करता है। इसके अंतर्गत, छात्र 1950 के दशक के राष्ट्र-निर्माण के दौर से लेकर वर्तमान डिजिटल युग तक के हिंदी सिनेमा की विकास यात्रा का अध्ययन करेंगे। पाठ्यक्रम का विशेष बल समकालीन विमर्शों पर है, जिसमें पितृसत्तात्मक संरचनाओं को चुनौती देने वाला 'स्त्री विमर्श', हाशिए के समाज की उपस्थिति और प्रतिरोध को स्वर देने वाला 'दलित', तथा पारिस्थितिकी तंत्र और विकास के संकटों को रेखांकित करने वाला 'पर्यावरण विमर्श' शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, यह कोर्स विकलांगता (Disability), वृद्ध विमर्श और तकनीकी प्रभाव से बदलते सिनेमाई सौंदर्यशास्त्र की भी पड़ताल करता है। इस अध्ययन के माध्यम से विद्यार्थी फिल्मों में निहित वैचारिकी, दृश्य-संकेतों और राजनीतिक उपपाठों (Subtext) को डिकोड करना सीखेंगे, जिससे उनमें समाज, कला और संस्कृति के अंतर्संबंधों को देखने की एक व्यापक और तार्किक समझ विकसित होगी
Course Outcomes:
- CO1 :विद्यार्थी हिंदी सिनेमा के विकासक्रम (1950 के दशक के राष्ट्र-निर्माण काल से लेकर समकालीन डिजिटल युग तक) को समझ सकेंगे, क्रमबद्ध रूप से वर्णन कर सकेंगे तथा ऐतिहासिक एवं सामाजिक संदर्भों में उसकी व्याख्या कर सकेंगे।
- CO2:विद्यार्थी सिनेमा को केवल मनोरंजन माध्यम के रूप में न देखकर एक वैचारिक एवं सामाजिक पाठ (Text) के रूप में विश्लेषण कर सकेंगे तथा उसके अंतर्निहित अर्थों, प्रतीकों एवं संकेतों को डिकोड कर सकेंगे।
- CO3: विद्यार्थी स्त्री विमर्श, दलित एवं आदिवासी विमर्श तथा पर्यावरण विमर्श जैसे समकालीन मुद्दों का विश्लेषण कर सकेंगे, फिल्मों में उनके प्रतिनिधित्व का आलोचनात्मक अध्ययन कर सकेंगे एवं उनके सामाजिक प्रभाव को स्पष्ट कर सकेंगे।
- CO4: विद्यार्थी फिल्मों में निहित विचारधारा, दृश्य-संकेतों (Visual Signs), प्रतीकों एवं राजनीतिक उपपाठों (Subtext) का सूक्ष्म विश्लेषण कर सकेंगे, विभिन्न फिल्मों के बीच तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत कर सकेंगे एवं तर्कसंगत व्याख्या कर सकेंगे।
- CO5: विद्यार्थी सिनेमा, समाज, सत्ता, प्रकृति एवं संस्कृति के अंतर्संबंधों का मूल्यांकन कर सकेंगे तथा समकालीन संदर्भों में सिनेमा की भूमिका और प्रभाव का आलोचनात्मक आकलन कर सकेंगे।
- CO6: विद्यार्थी सिनेमा के बदलते सौंदर्यशास्त्र, डिजिटल तकनीक के प्रभाव तथा नए विमर्शों के संदर्भ में आलोचनात्मक, सृजनात्मक एवं अकादमिक अभिव्यक्ति प्रस्तुत कर सकेंगे (जैसे फिल्म समीक्षा, प्रस्तुति, लघु लेख आदि)।
Modules and Readings
मॉड्यूल 1 - हिंदी सिनेमा: इतिहास और वैचारिक पृष्ठभूमि
यह मॉड्यूल हिंदी सिनेमा के विकासक्रम को मूक फिल्मों से सवाक फिल्मों तक की यात्रा के संदर्भ में प्रस्तुत करता है। इसमें सिनेमा और राष्ट्रवाद के संबंध को आज़ादी से पूर्व और पश्चात के परिप्रेक्ष्य में समझाया जाता है, विशेष रूप से नेहरूवादी समाजवाद की पृष्ठभूमि में। साथ ही, मुख्यधारा सिनेमा और समानांतर सिनेमा के बीच यथार्थवाद और मनोरंजन के द्वंद्व का विश्लेषण करते हुए यह स्पष्ट किया जाता है कि सिनेमा किस प्रकार सामाजिक यथार्थ और वैचारिक प्रवृत्तियों को अभिव्यक्त करता है।
निर्धारित विषय:
- सिनेमा का विकास: मूक फिल्मों से सवाक फिल्मों तक का सफर।
- राष्ट्रवाद और सिनेमा: आजादी के पूर्व और पश्चात का परिदृश्य (नेहरूवादी समाजवाद)।
- यथार्थवाद बनाम मनोरंजन: समानांतर सिनेमा (Parallel Cinema) और मुख्यधारा का द्वंद्व।
निर्धारित फिल्में (Core Readings):
- मदर इंडिया (1957) - राष्ट्र और किसान विमर्श।
- प्यासा (1957) - आधुनिकता और मोहभंग।
- दो बीघा ज़मीन (1953) - नव-यथार्थवाद और ग्रामीण संघर्ष।
- नया दौर (1957) - मशीन बनाम मनुष्य का द्वंद्व।
Suggested Readings:
- गोविंद निहलानी (संपादक): विश्व सिनेमा का इतिहास
- जवरीमल्ल पारख: हिंदी सिनेमा का समाजशास्त्र (ग्रंथ शिल्पी)
- अमृत गंगर: सिनेमा के सौ साल
- प्रो. रमा हिंदी सिनेमा में साहित्यिक विमर्श
- Bansal, B.R.: History of Indian Cinema
- अनुपम ओझा: सिनेमा का सिद्दांत और हिंदी सिनेमा
माड्यूल 2 स्त्री विमर्श और हिंदी सिनेमा
इस मॉड्यूल में हिंदी सिनेमा में स्त्री के प्रतिनिधित्व का अध्ययन पारंपरिक ‘आदर्श नारी’ की छवि से लेकर समकालीन स्त्री की स्वायत्तता और आत्म-पहचान तक किया जाएगा । ‘मेल गेज़’ की अवधारणा के माध्यम से कैमरे की दृष्टि और स्त्री के वस्तुकरण का विश्लेषण किया जाता है। साथ ही, महिला निर्देशकों की भागीदारी और उनके दृष्टिकोण के माध्यम से सिनेमा में स्त्री अनुभव की विविध अभिव्यक्तियों को समझने पर बल दिया जाता है।
निर्धारित विषय:
- पारंपरिक छवि: आदर्श नारी (सती-सावित्री) से 'मदर इंडिया' तक।
- बदलता नजरिया: आधुनिक सिनेमा में स्त्री की स्वायत्तता और आत्म-खोज।
- मेल गेज़ (Male Gaze): कैमरे की नजर और महिला पात्रों का वस्तुकरण।
- महिला निर्देशक: फिल्म निर्माण में महिलाओं का दृष्टिकोण और भागीदारी।
निर्धारित फिल्में (Core Readings):
- मिर्च मसाला (1987) - पितृसत्ता के विरुद्ध सामूहिक प्रतिरोध।
- अर्थ (1982) - वैवाहिक संस्था और मानसिक स्वतंत्रता।
- क्वीन (2013) - आधुनिक स्त्री की पहचान का संकट और समाधान।
- पिंक – (2016) – लैंगिक समानता एवं न्याय व्यवस्था
- थप्पड़ (2020) - घरेलू हिंसा और सामाजिक मानदंडों पर प्रहार।
Suggested Readings:
- प्रो. रमा हिंदी सिनेमा में आधी आबादी
- मैत्रेयी पुष्पा: स्त्री विमर्श और सिनेमा
- रश्मि शर्मा: हिंदी सिनेमा में नारी चित्रण
- अनामिका: स्त्रीत्व का मानचित्र (पृष्ठभूमि के लिए)
माड्यूल3 -दलित एवं आदिवासी विमर्श
यह मॉड्यूल हिंदी सिनेमा में हाशिए के समाजों—विशेषतः दलित और आदिवासी समुदायों—के प्रतिनिधित्व का अध्ययन करता है। इसमें प्रारंभिक फिल्मों में उनकी अदृश्यता या रूढ़िवादी चित्रण से लेकर समकालीन सिनेमा में उभरते प्रतिरोध और अस्मिता के प्रश्नों का विश्लेषण किया जाता है। जल, जंगल और ज़मीन से जुड़े मुद्दों, विस्थापन की समस्या तथा जाति-आधारित सत्ता संरचनाओं के सिनेमाई निरूपण को आलोचनात्मक दृष्टि से समझाया जाता है।
निर्धारित विषय:
अदृश्यता से मुख्यधारा तक: शुरुआती फिल्मों में हाशिए के समाज का रूढ़िवादी चित्रण।
प्रतिरोध का स्वर: समकालीन सिनेमा में दलित पहचान और अस्मिता का संघर्ष।
आदिवासी अस्मिता: जल-जंगल-जमीन के सवाल और विस्थापन की समस्या।
जाति और सत्ता संरचना: सिनेमाई कहानियों में छिपे जातिगत पूर्वाग्रहों का विश्लेषण।
निर्धारित फिल्में (Core Readings):
- अंकुर (1974) - सामंती व्यवस्था और शोषण।
- मसान (2015) - जातिगत सीमाओं और मानवीय आकांक्षाओं का चित्रण।
- आर्टिकल 15 (2019) - संवैधानिक अधिकार और सामाजिक भेदभाव।
- चक्रव्यूह (2012) - आदिवासी विस्थापन और व्यवस्था का द्वंद्व।
Suggested Readings:
- ओमप्रकाश वाल्मीकि: दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र
- रजत राणी हार्वे: हिंदी सिनेमा और दलित विमर्श (वाणी प्रकाशन)
- रामावतार त्यागी: सिनेमा और समाज
- Suraj Yengde: Caste Matters (सिनेमा में प्रतिनिधित्व के संदर्भ में विशेष ले
- रमेश नंदन: हाशिये का सिनेमा
माड्यूल 4 पर्यावरण और उभरते सामाजिक विमर्श
इस मॉड्यूल में समकालीन सिनेमा के माध्यम से पारिस्थितिकी, जलवायु परिवर्तन और विकास के संकटों का अध्ययन किया जाता है। इसके साथ ही, विकलांगता विमर्श के अंतर्गत दिव्यांग पात्रों के चित्रण को सहानुभूति से सशक्तिकरण तक के परिप्रेक्ष्य में समझा जाता है। वृद्ध विमर्श तथा डिजिटल तकनीक के प्रभाव के माध्यम से बदलते पारिवारिक ढांचे और सिनेमाई सौंदर्यशास्त्र की भी पड़ताल की जाती है, जिससे सिनेमा और समाज के अंतर्संबंधों की समग्र समझ विकसित होती है।
निर्धारित विषय:
- पारिस्थितिकी (Ecocriticism): सिनेमा में प्रकृति और मानव-वन्यजीव संघर्ष।
- जलवायु परिवर्तन: विकास की अवधारणा और प्राकृतिक संकटों का चित्रण।
- विकलांगता (Disability) विमर्श: दिव्यांग पात्रों का चित्रण—सहानुभूति से सशक्तिकरण तक।
- वृद्ध विमर्श एवं डिजिटल तकनीक: बदलते पारिवारिक ढांचे और सौंदर्यशास्त्र पर प्रभाव।
निर्धारित फिल्में (Core Readings):
- शेरनी (2021) - पर्यावरण राजनीति और वन्यजीव संरक्षण।
- जल (2014) – जल संकट एवं पर्यावरण समस्या
- कोशिश (1972) - दिव्यांगजनों की गरिमा और सामाजिक संघर्ष।
- तारे ज़मीन पर (2007) - मानसिक स्वास्थ्य और शिक्षा प्रणाली की संवेदनशीलता।
- स्पर्श - शारीरिक अक्षमता और मानवीय इच्छाशक्ति।
Suggested Readings:
- विजय अग्रवाल: सिनेमा: कल, आज और कल
- अजय ब्रह्मत्मज: सिनेमा और बाज़ार
- Rachel Dwyer: Filming the Gods: Religion and Indian Cinema
- सुधीश पचौरी: उत्तर-आधुनिकता और सिनेमा
- अनुपमा चोपड़ा: किंग ऑफ बॉलीवुड (वैश्वीकरण और शाहरुख खान के उदय के माध्यम से बाजार को समझना)
Assessment (Including Skills to be tested as per NCRF):
- Response Essay/ Assignment-1 (25 Marks)
- Midterm Exam/PPT/Assignment-2 (25 Marks)
- End Term Exam (50 Marks)
डॉ. बी. आर. अम्बेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली