| Course Type | Course Code | No. Of Credits |
|---|---|---|
| Discipline Core | 4 |
Course Coordinator(s) हिंदी संकाय
Does the course connect to, build on or overlap with any other courses offered in AUD? No
Specific requirements on the part of students who can be admitted to this course: None (Pre-requisites; prior knowledge level; any others – please specify)
No. of students to be admitted (with justification if lower than the usual cohort size is proposed): विश्वविद्यालय नियमानुसार
Course scheduling (semester; semester-long/half-semester course; workshop mode; seminar mode; any other – please specify): Semester long
How does the course link with the vision of AUD?
How does the course link to the specific programme(s) in which it is offered?
पाठ्यक्रम विवरण (Course Description)
यह पाठ्यक्रम विद्यार्थियों को उनके न सिर्फ सांस्कृतिक अतीत से परिचित कराएगा बल्कि मौजूदा समय तक चली आ रही विभिन्न पुरानी काव्य सारणियों को व्याख्यायित व विश्लेषित करने का अवसर भी प्रदान करेगा। पाठ्यक्रम विद्यार्थी को अपभ्रंश से हिंदी कविता में संक्रमण, वीरगाथा व ऋगारिक काव्य से परिचित कराएगा। साथ ही भक्ति काव्य की अखिल भारतीय स्वरूप का परिचय देते हुए हिंदी की संतकाव्य धारा, प्रेमाख्यान काव्यधारा, रामभक्ति व कृष्णभक्ति काव्यधारा के प्रमुख कवियों की कविताओं को पढ़ने व विश्लेषित करने की क्षमता विद्यार्थियों में विकसित करेगा। इन कविताओं के अध्ययन के क्रम में भक्ति आंदोलन की विभिन्न दार्शनिक सरणियों का भी परिचय दिया जा सकेगा। रीतिकाव्य के विभिन्न कवियों की ऋगार, भक्ति व वीर रस की कविताओं का अध्ययन भी विद्यार्थी इस पाठ्यक्रम में कर सकेगा। इस पाठ्यक्रम में हिंदी की आदिकालीन कविता के प्रमुख कवियों के अध्ययन के ज़रिए विद्यार्थी हिंदी कविता की आरम्भिक भाषा व बूंदों से परिचित होंगे साथ ही मातृभाषाओं के काव्यभाषा में विकसित होने और इहलौकिकता के आगमन को भी रेखांकित किया जा सकेगा। समग्रतया यह पाठ्यक्रम हिंदी की पूर्व आधुनिक काव्य-परम्पराओं को समझने के औज़ार विकसित करने का लक्ष्य रखता है।
पाठ्यक्रम उद्देश्य (Course Objectives)
- यह पाठ्यक्रम विद्यार्थियों को अपनी सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराते हुए उन्हें उसके आलोचनात्मक विश्लेषण के लिए तैयार करेगा।
- यह पाठ्यक्रम लोकभाषाओं के काव्यभाषा बनाने की प्रक्रिया में दर्ज काव्यात्मक अभिव्यक्तियों से विद्यार्थियों को परिचित कराएगा।
- भारत का सांस्कृतिक अतीत आदिकालीन, भक्तिकालीन व रीतिकालीन कविता के साथ गुँथा हुआ है। ऋगार, वीर व भक्ति जैसे भाव मानव समाज के साथ लम्बी ऐतिहासिक प्रक्रिया में विविध साहित्यिक अभिव्यक्तियाँ पाते रहे हैं। इन सभी भावों से विद्यार्थिओं को परिचित कराया जाएगा जिससे वे सामाजिक सरोकारों के प्रति सचेत बनें व उनके अंदर सामूहिकता की भावना विकसित हो सके।
- हिंदी साहित्य की समग्र काव्य विरासत का बड़ा हिस्सा पूर्व - आधुनिक कविताओं के रूप में मौजूद है। यह कविता अपभ्रंशों से हिंदी में संक्रमण और विभिन्न लोकभाषाओं के काव्यभाषा में विकसित होने की प्रक्रियाओं को भी दर्ज करती है। इस दौर के काव्य के अध्ययन के बिना हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर स्तर की पढ़ाई पूरी नहीं हो सकती।अतः इस पाठ्यक्रम के अध्यापन के जरिये विद्यार्थियों को पूर्व-आधुनिक साहित्यिक विरासत से परिचित कराया जाएगा।
Course Outcomes
Course Outcomes describe what students are expected to know and be able to do by the end of a specific course. Each CO should be clearly observable and measurable. Mention 4-6 course outcomes. At the end of the course, students will be able to:
- CO1: प्राचीन कविता के विश्लेषण में सक्षम हो सकेंगे।
- CO2: काव्यात्मक सांस्कृतिक परम्परा का बोध प्राप्त कर उसके विश्लेषण के औज़ार विकसित कर सकेंगे।
- CO3: पूर्व आधुनिक हिंदी कविता के घटक तत्वों का बोध प्राप्त कर सकेंगे
- CO4: भक्ति, श्रृंगार व अन्य रसों की काव्यात्मक अभिव्यक्तियों के अंतरसंबंध को समझ सकेंगे
- CO5: रीति के विभिन्न सम्प्रदायों में विभेद व विश्लेषण कर सकेंगे
- CO6: काव्य के लोक से लेकर शास्त्रीय आचार्य पद्धति का तुलनात्मक विश्लेषण करने में सक्षम हो सकेंगे.
Modules and Readings
In this section, provide the name of the modules along with a brief description and references(Core and Suggested)
मॉड्यूल-1 :आदिकालीन कविता
हिंदी की आरम्भिक कविता को श्रृंगार व वीरगाथा काव्य के रूप में देखा जाता रहा है। इस माड्यूल में विद्यार्थियों को इन दोनों ही तरह की कविताओं से परिचित कराया जाएगा। बीसलदेव रासो में राजमती का वियोग वर्णन लोक की बारहमासा परम्परा की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है जो आगे चलकर जायसी व अन्य कवियों में में अपनी पूर्णता प्राप्त करती है। जगनिक का परमाल रासो विभिन्न रूपों में आज भी लोक काव्य के बतौर जीवित है। इस माड्यूल में इस तरह की कृतियों की प्रामाणिकता के साथ ही लोक और साहित्य के बीच की आवाजाही को रेखांकित किया जा सकेगा। अब्दुल रहमान की संदेश रासक, संदेश काव्य की हिंदी परम्परा की प्रांभिक अभिव्यक्तियों में से एक है। इस माड्यूल में विद्यार्थी रासक के ज़रिए काव्य औचित्य व विधान की जानकारी हासिल कर सकेंगे। हर काव्य प्रवृत्ति में आने वाले समय की कविता के बीज छिपे होते हैं। विद्यापति की कविताएँ इसका स्पष्ट उदाहरण हैं, जहाँ क्रंगार के साथ भक्ति की प्रवृत्ति भी दीखती है। इस माड्यूल में विद्यापति के ज़रिए आदिकालीन कविता के भक्तिकाव्य में संक्रमण की चर्चा भी की जाएगी।
पाठः
बीसलदेव रासो (राजमती वियोग खंड), आल्हखंड (नरवलगढ़ की लड़ाई), संदेश रासक [प्रथम खंड), विद्यापति की पदावल
सहायक पाठ्य सामग्री:
- बीसलदेव रासो, सम्पादकः माताप्रसाद गुप्त व नाहटा, हिंदी परिषद प्रकाशन, इलाहाबाद, सम्बत 2010
- आल्हखंड बहा, सम्पादकः नारायण प्रसाद सीताराम, लक्ष्मी वेंकटेश्वर प्रेस, वम्बई, सम्बत 1977
- संदेश रासक, सम्पादकः हजारी प्रसाद द्विवेदी व विश्वनाथ त्रिपाठी, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1975
- विद्यापति पदावली, सम्पादकः शिव प्रसाद सिंह, हिंदी प्रचारक पुस्तकालय, वाराणसी, 1964
माड्यूल 2: निर्गुण काव्य
भक्ति कविता का उदय एक अखिल भारतीय परिघटना थी। इस समय की कविता अपने भीतर विविध स्वर लिए हुए है। भक्ति इन विभिन्न स्वरों को एक राग में पिरोने वाला तत्व है। संत काव्य परम्परा मुख्य रूप से समाज में मौजूद अंतर्विरोधों की स्थानीय भाषा में काव्यात्मक अभिव्यक्ति है। इस माड्यूल में रैदास और उनकी बेगमपुर की अवधारणा को पड़ते हुए विद्यार्थी भारतीय समाज में मौजूद जाति के बंधनों और उससे पार जाने की इच्चद्रा से परिचित होंगे। कबीर फटकार कर सच कहने और सहज रहने के कवि हैं। कबीर की कविता का एक छोर सिद्ध और नाथ परम्परा से जुड़ता है और दूसरा छोर उनके वर्तमान में मौजूद सामाजिक व आध्यात्मिक सवालों से बंधा हुआ है। इस माड्यूल में कबीर को पड़ते हुए विद्यार्थी न केवल कबीर की कविताई से परिचित होंगे बल्कि पिछले छः सौ वर्षों में भारतीय समाज द्वारा लगातार गड़े व आविष्कृत किए गए कबीर का भी परिचय हासिल करेंगे। रैदास और कवीर जाति विरोधी आंदोलन के पुरखे कहे जाते हैं। निर्गुण कविता की दूसरी धारा प्रेमाख्यान कविता की है। इन्हें कहाँ तक सूफी काव्य माना जाए, इसे लेकर हिनदी काव्य आलोचकों में बहस रही है। ये प्रेमाख्यान अपने स्वरूप के लिए भले ही फ़ारसी काव्य परम्परा से सम्बद्ध दिखाए जा सकें, पर वे अपनी अंतर्वस्तु में भारतीय काव्य परंपरा से गहराई से जुड़े हुए हैं। मंझन की मधुमालती और जायसी का पद्मावत महाकाव्य परम्परा के महत्वपूर्ण पड़ाव हैं। प्रेम लौकिक के साथ पारलौकिक भी है, इन कवियों की कविता को पड़ते हुए विद्यार्थी इहलौकिकता और पारलौकिकता के गहन सम्बंध को उद्घाटित कर सकेंगे।
पाठ:
रैदास [पद और दोहे), जायसी स्तुति व नागमती वियोग खंड), कबीर [पद और दोहे), मंझन (मधुमालती का बारहमासा]
सहायक पाठ्य सामग्री:
- रैदास बानी, सम्पादकः शुकदेव सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2003
- जायसी और उनका पद्मावत, सम्पादकः हजारी प्रसाद द्विवेदी, हिंदी साहित्य संसार, दिल्ली,1959
- कबीर, सम्पादकः हजारी प्रसाद द्विवेदी, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1996
- मधुमालती, सम्पादकः माता प्रसाद गुप्त, मित्र प्रकाशन, इलाहाबाद, 1961
माड्यूल 3: सगुण काव्य
भक्ति की सगुण काव्य परम्परा मुख्य रूप से कृष्ण और राम भक्ति काव्यधारा के रूप में विभाजित की जाती है। सूरदास की कविता में कृष्ण की बाल लीलाओं और गोपियों के विरह को उद्घाटित करते हुए यह माड्यूल वात्सल्य प्रेम की उदात्तता की चर्चा करेगा और भ्रमर गीत के ज़रिए सगुण और निर्गुण के बीच की बहसों से विद्यार्थी को परिचित कराएगा। भक्ति कविता की एक विशिष्टता इसमें रखी स्वर का होना भी है। मीरों का काव्य प्रेम व भक्ति के लिए सामाजिक वर्जनाओं का अतिक्रमण करने का काव्य भी है। इस माड्यूल में मीरों की कविता के ज़रिए विद्यार्थी न केवल भक्ति कविता के रखी स्वर से परिचित होंगे बल्कि मध्यकालीन समाज में महिला की प्रतिरोधी मौजूदगी से भी बाक़िफ़ हो सकेंगे। दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता में रसखान के इहलौकिक प्रेम के पारलौकिक होने का उल्लेख है। रसखान की कविता विह्वल भाव से कृष्ण के प्रेम की कविता है। इस माड्यूल में विद्यार्थी रसखान के प्रस्थान बिंदु और उनकी कृष्णभक्ति के स्वरूप से परिचित हो सकेंगे। तुलसी रामभक्ति की मर्यादावादी कविता के प्रतिनिधि कवि हैं। यहाँ भक्ति लोक मंगल की भूमि पर संचरित होती है लेकिन अन्य भक्त कवियों की तरह ही तुलसी की कविता भी अपने समय के तनावों से मुक्त नहीं है। इस माड्यूल में कलियुग वर्णन का अध्ययन करते हुए विद्यार्थी तुलसी के काव्य पर अपने समय के दबावों की शिनाख्त करने में सक्षम हो सकेंगे। साथ ही कवितावली के चुने हुए अंश कवि के बतौर तुलसी काव्य की विविधता से विद्यार्थियों को परिचित करा सकेंगे।
पाठः
सूरदास (भ्रमरगीत व बाललीला के चुनिंदा पद, मीरों (चुनिंदा पद], रसखान (चुनिंदा छंद), तुलसीदास [ रामचरित मानस से कलियुग वर्णन व कवितावली से राम वन गमन
सहायक पाठ्य सामग्री:
- सम्पूर्ण सूरसागर, सम्पादकः किशोरी लाल गुप्त, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2010
- मीराबाई की पदावली, सम्पादकः आचार्य परशुराम चतुर्वेदी, साहित्य सम्मेलन, प्रयाग, इलाहाबाद, 1967
- रसखान रचनावली, सम्पादकः विद्यानिवास मित्र व सत्यदेव मिश्र, जैनिथ पब्लिशर्स, दिल्ली, 2005
- रामचरित मानस, सम्पादकः राम नरेश त्रिपाठी, राजपाल एंड संस प्रकाशन, दिल्ली, 1951
- कवितावली, सम्पादकः लाला भगवान दीन, रामनारायण लाल बेनीप्रसाद प्रकाशन, इलाहाबाद, सम्वत 2013
माड्यूल 4:रीति काव्य
भक्ति काव्य का अवसान होने के बावजूद कृष्ण भक्ति और काव्यभाषा के बतौर ब्रजभाषा आगे तक विकसित हुई। ब्रज भाषा के वर्चस्व का आलम यह था कि तुलसी को भी ब्रज भाषा में रचना करनी पड़ी और सुदूर पूर्वोत्तर से लेकर दकन तक स्थानीय पुट के साथ ब्रज नए समय की काव्यभाषा बन गयी। अब भक्ति का आवरण भेदते हुए इहलौकिकता सामने आने लगी जिसके बारे में उसी समय के एक कवि ने लिखा था कि 'आगे के कवि रीझिहैं तो कविताई नहीं राधिका कन्हाई सुमिरन को बहानो है। केशव रीतिकाव्य के आचार्य कवि हैं। यद्यपि इस दौर के आचार्यों ने सिद्धांत कथन में मौलिक होने की जगह संस्कृत काव्य सिद्धांतों को ही आधार बनाया है परंतु हिंदी कविता के लिए यह नयी प्रवृत्ति जरूर थी। देव का काव्य विविधता पूर्ण होने के साथ ही सिद्धांत कथन के काव्य रूपांतरण का बेहतरीन उदाहरण है। बिहारी ने अपभ्रंश के दोहा छंद का जैसा परिष्कार किया और उसे भाव वहाँ में जैसा सक्षम बनाया, वह अभूतपूर्व था। घनानंद रीति कविता के भीतर से रीति को चुनौती देने वाले कवि हैं। भूषण की कविता वीर रस की प्राचीन काव्य परम्परा का रीतिकालीन नवोत्थान है जिसे आलोचकों ने राष्ट्र की धारणा से भी जोड़ने की कोशिश की है। इस माड्यूल में निर्धारित कविताओं के माध्यम से विद्यार्थी रीति निर्माण, रीति के अनुप्रयोगों और रीति साहित्य के भीतर से उपजी चुनौतियों की समझ हासिल कर सकेंगे।
पाठः
केशव [कविप्रिया से चुनिंदा पद), देव (चुनिंदा पद), बिहारी (चुनिंदा दोहे), धनांनद [चुनिंदा पद) और भूषण [चुनिंदा पद।
सहायक पाठ्य सामग्री:
- प्रिया-प्रकाश अर्थात कविप्रिया, सम्पादकः लाला भगवान दीन, नेशनल प्रेस, बनारस, सम्वत 1982
- देव-सुधा, सम्पादकः मिश्र बंधु, गंगा ग्रंथागार, लखनऊ, सम्बत 2002
- बिहारी सतसई, सम्पादकः पद्मसिंह शर्मा, ज्ञान मंडल प्रकाशन, काशी, सम्बत 1975
- धनांनद कवित्त, सम्पादकः चंद्रशेखर मिश्र शाखी, वाणी वितान प्रकाशन, वाराणसी, सम्वत 2017
- भूषणग्रंथावली, सम्पादकः मित्रबंधु, नागरीप्रचारिणी सभा, काशी. 1916
Assessment (Including Skills to be tested as per NCrF):
- Response Essay/PPT/Assignment-1 ( 25Marks)
- Midterm Exam/PPT/Assignment-2/Project (25 Marks)
- End Term Exam (50 Marks)
डॉ. बी. आर. अम्बेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली